पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका संघर्ष के चलते वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ा है। इस संकट के बीच कई देशों को ईंधन की कमी और महंगाई का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन भारत ने अपनी रणनीतिक नीति के जरिए इस स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने के कारण भारत में इसकी खपत में लगभग 15% की गिरावट दर्ज की गई। इसके बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल की कोई बड़ी किल्लत देखने को नहीं मिली। इसकी सबसे बड़ी वजह रूस से कच्चे तेल के आयात में की गई भारी बढ़ोतरी रही।
मार्च महीने में भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात फरवरी की तुलना में करीब 90% तक बढ़ा दिया। दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच जहां आयात अपेक्षाकृत कम था, वहीं मार्च में इसमें जबरदस्त उछाल देखने को मिला। यह कदम भारत के ऊर्जा प्रबंधन की दूरदर्शिता को दर्शाता है।
इस बढ़ोतरी के पीछे एक और अहम कारण अमेरिका द्वारा दी गई 30 दिन की विशेष छूट रही, जिसका भारत ने भरपूर लाभ उठाया। इस छूट के चलते भारत ने रूस से सस्ते दरों पर कच्चा तेल खरीदकर अपनी आपूर्ति को स्थिर बनाए रखा।
केवल रूस ही नहीं, बल्कि भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अफ्रीकी देशों जैसे अंगोला, गैबॉन, घाना और कांगो से भी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया। हालांकि इन देशों की कुल हिस्सेदारी सीमित रही, लेकिन यह कदम सप्लाई को विविध बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में उत्पन्न बाधाओं के कारण ऊर्जा आपूर्ति पर अतिरिक्त दबाव पड़ा। इसका असर एलपीजी और एलएनजी आयात पर भी देखने को मिला। रिपोर्ट के अनुसार, एलपीजी आयात में करीब 40% की गिरावट आई, जिससे सरकार को वैकल्पिक उपाय अपनाने पड़े।

स्थिति को संभालने के लिए भारत ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के लिए आपूर्ति को सीमित किया। इससे देश के 33 करोड़ से अधिक घरेलू उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकी।
कुल मिलाकर, वैश्विक संकट के बीच भारत की ऊर्जा नीति और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता ने देश को बड़े ईंधन संकट से बचा लिया। रूस से आयात बढ़ाने, अमेरिका की छूट का लाभ उठाने और सप्लाई स्रोतों में विविधता लाने जैसे कदमों ने यह साबित किया कि सही रणनीति से बड़े संकटों का सामना प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

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