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“खेत बचेंगे तो भविष्य बचेगा”: जल संकट और जलवायु परिवर्तन से निपटने को किसानों का मंथन, रामनगर में हुई किसान संगोष्ठी

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‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत काजरी और भारतीय किसान संघ की पहल, वैज्ञानिकों व प्रगतिशील किसानों ने टिकाऊ खेती और जल संरक्षण पर दिया जोर

 जोधपुर।देशभर में चलाए जा रहे “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत सोमवार को जोधपुर जिले के रामनगर गांव स्थित जसनाथ फार्म हाउस में किसान संगोष्ठी का आयोजन किया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), जोधपुर तथा भारतीय किसान संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में क्षेत्रभर के किसानों ने बड़ी संख्या में भाग लेकर खेती, जल संकट, जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ कृषि के मुद्दों पर गंभीर चर्चा की।

कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप खेती के नए तौर-तरीकों से परिचित कराना तथा जल संरक्षण के महत्व को समझाना था। संगोष्ठी में वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों और प्रगतिशील किसानों ने खेती को भविष्य की चुनौतियों से बचाने के लिए व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए काजरी की वरिष्ठ वैज्ञानिक पूनम कालश ने कहा कि वर्तमान समय में कृषि केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से भी जुड़ चुकी है। उन्होंने बताया कि लगातार गिरता भूजल स्तर, अनियमित मानसून और बढ़ता तापमान किसानों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। यदि समय रहते जलवायु-अनुकूल खेती, सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली, फसल विविधीकरण तथा वैज्ञानिक तकनीकों को नहीं अपनाया गया तो आने वाले वर्षों में कृषि उत्पादन और किसानों की आय दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

उन्होंने किसानों से पानी की प्रत्येक बूंद का सदुपयोग करने और क्षेत्र की जलवायु एवं मिट्टी के अनुसार फसलों का चयन करने का आह्वान किया। उनका कहना था कि संसाधनों का संतुलित उपयोग ही कृषि को दीर्घकालीन रूप से सुरक्षित बना सकता है।

भारतीय किसान संघ की प्रांत मंत्री एवं प्रगतिशील महिला किसान विमला सियाग ने कहा कि किसान केवल अन्नदाता नहीं बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षक भी हैं। उन्होंने कहा कि खेती में अंधाधुंध संसाधनों के दोहन के बजाय टिकाऊ और संतुलित कृषि मॉडल अपनाना आज की आवश्यकता है। उन्होंने महिला किसानों की भूमिका पर विशेष जोर देते हुए कहा कि जल संरक्षण, जैविक खेती और पोषण सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है।

विमला सियाग ने कहा कि यदि गांव की महिलाएं जागरूक होकर कृषि और पर्यावरण संरक्षण की गतिविधियों से जुड़ेंगी तो ग्रामीण क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन की नई शुरुआत होगी। उन्होंने किसानों से आधुनिक तकनीक और नवाचारों को अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी बनाने का आह्वान किया।

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भारतीय किसान संघ के जिला मंत्री एवं युवा प्रगतिशील किसान मेघाराम तरड़ ने कहा कि राजस्थान जैसे शुष्क प्रदेश में खेती का भविष्य पूरी तरह पानी पर निर्भर है। यदि आज जल संरक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि तिंवरी, बावड़ी, भोपालगढ़ और बिलाड़ा सहित कई क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, जो चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि किसानों को केवल उत्पादन बढ़ाने की मानसिकता से आगे बढ़कर “प्रति बूंद अधिक उत्पादन” और “प्रति क्विंटल अधिक लाभ” की सोच विकसित करनी होगी। उन्होंने बाजरा, मूंग, मोठ और ग्वार जैसी कम पानी वाली फसलों को भविष्य की कृषि सुरक्षा का आधार बताते हुए इनके उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।

मेघाराम तरड़ ने किसानों को कृषि प्रसंस्करण की दिशा में आगे बढ़ने का भी सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि बाजरा आधारित बिस्कुट, कुकीज़, आटा, लड्डू और अन्य उत्पादों की लघु इकाइयां स्थापित कर किसान अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “जब किसान अपनी उपज का उत्पादक होने के साथ-साथ उद्यमी और व्यापारी भी बनेगा, तभी उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।”

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उन्होंने कहा कि खेत बचाने का अर्थ केवल कृषि भूमि को बचाना नहीं है, बल्कि मिट्टी, पानी, पर्यावरण, किसान और गांवों के भविष्य को सुरक्षित करना भी है। खेती को प्रकृति के साथ जोड़कर आगे बढ़ाने से ही कृषि लाभकारी और टिकाऊ बन सकेगी।

संगोष्ठी में भारतीय किसान संघ की महिला प्रमुख हेमलता चौधरी, बावड़ी तहसील उपाध्यक्ष गणेशराम बेनीवाल, रामपुरा मंत्री थानाराम देवासी, केलावा ग्राम इकाई अध्यक्ष पोकर गिरी सहित बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष किसानों ने भाग लिया।

कार्यक्रम के अंत में किसानों ने जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, जलवायु-अनुकूल खेती तथा कृषि नवाचारों को अपनाने का सामूहिक संकल्प लिया। संगोष्ठी का मुख्य संदेश रहा कि “पानी बचेगा तो खेत बचेगा, खेत बचेगा तो किसान बचेगा और किसान बचेगा तो देश की खाद्य सुरक्षा सुरक्षित रहेगी।”

 

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