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अमेरिका-ईरान तनाव: डोनाल्ड ट्रंप बोले—नई डील होगी JCPOA से बेहतर, शांति वार्ता पर बना संशय

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अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बना हुआ है और सीजफायर की डेडलाइन नजदीक आने के बावजूद दोनों देशों के बीच शांति को लेकर कोई ठोस सहमति बनती नजर नहीं आ रही है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने स्पष्ट कहा है कि ईरान के साथ संभावित नई डील पर उनके ऊपर किसी तरह का दबाव नहीं है और यह समझौता पहले की तुलना में कहीं बेहतर होगा।

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नई डील को लेकर ट्रंप का बड़ा दावा

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका जिस नई डील पर काम कर रहा है, वह Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) से कहीं ज्यादा मजबूत और सुरक्षित होगी। JCPOA को आमतौर पर ‘ईरान न्यूक्लियर डील’ कहा जाता है, जिसे Barack Obama और Joe Biden के कार्यकाल में तैयार किया गया था।

ट्रंप ने आरोप लगाया कि यह डील अमेरिका की सुरक्षा से जुड़ी सबसे खराब समझौतों में से एक थी और इससे ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने का रास्ता मिल सकता था। उन्होंने कहा कि उनकी प्रस्तावित नई डील में ऐसी कोई संभावना नहीं होगी।

ईरान को नकद भेजने का आरोप

ट्रंप ने अपने बयान में यह भी दावा किया कि पिछली सरकार के दौरान ईरान को बड़ी मात्रा में नकद राशि भेजी गई थी। उनके अनुसार लगभग 1.7 अरब डॉलर नकद एक विमान में लादकर ईरान भेजे गए थे, जिससे वहां का नेतृत्व अपनी मर्जी से खर्च कर सके।

उन्होंने यह भी कहा कि यह नकदी अमेरिका के कई बैंकों से इकट्ठी की गई थी और यह एक असामान्य कदम था, जिसने उस समय कई सवाल खड़े किए थे।

मीडिया और पिछली सरकार पर निशाना

डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी मीडिया और कुछ पत्रकारों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि कई लोग JCPOA का समर्थन करते रहे हैं, जबकि उनके अनुसार यह डील अमेरिका के लिए ‘खतरनाक’ और ‘शर्मनाक’ थी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनकी अगुवाई में नई डील होती है, तो यह न सिर्फ अमेरिका बल्कि इजरायल, यूरोप और पूरे मिडिल-ईस्ट क्षेत्र के लिए सुरक्षा की गारंटी बनेगी।

मिडिल-ईस्ट में शांति को लेकर बयान

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ट्रंप ने कहा कि अगर उन्होंने पहले वाली डील को समाप्त न किया होता, तो मिडिल-ईस्ट क्षेत्र में परमाणु हथियारों का खतरा और बढ़ सकता था। उनके अनुसार नई डील का उद्देश्य क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

शांति वार्ता पर बना संशय

इस समय अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी और कड़े रुख के कारण समझौता आसान नहीं होगा। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि सीजफायर की समयसीमा से पहले कोई ठोस समाधान निकल पाता है या नहीं।

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