अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों (ओएमसी) पर पड़ रहा है। बढ़ती लागत और स्थिर खुदरा कीमतों के कारण कंपनियां भारी घाटे का सामना कर रही हैं, जिससे पूरे ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बढ़ गया है।

पेट्रोल, डीजल और एलपीजी पर भारी नुकसान
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों (ओएमसी) पर पड़ रहा है। बढ़ती लागत और स्थिर खुदरा कीमतों के कारण कंपनियां भारी घाटे का सामना कर रही हैं, जिससे पूरे ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि मई के अंत तक इन तीनों उत्पादों पर कुल घाटा लगभग ₹40,484 करोड़ तक पहुंच सकता है। यह आंकड़ा सरकार और तेल कंपनियों दोनों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उछाल
Ministry of Petroleum and Natural Gas के अनुसार, पिछले एक महीने में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 100% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
पिछले लगभग चार वर्षों से देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं, जबकि दुनिया के कई देशों में इनकी कीमतों में 30% से 50% तक की बढ़ोतरी देखी गई है।
एलपीजी बाजार में भी संकट

एलपीजी सेक्टर की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एलपीजी की कीमतों में तेज उछाल आया है। सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस मार्च के $542 प्रति मीट्रिक टन से बढ़कर अप्रैल में $780 प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गया है।
इस बढ़ोतरी के पीछे एक बड़ी वजह Strait of Hormuz में आपूर्ति बाधित होना है, जहां वैश्विक एलपीजी सप्लाई का लगभग 30% प्रभावित हुआ है।
लंबे समय से घाटे में तेल कंपनियां
पिछले दो वर्षों से एलपीजी कारोबार तेल कंपनियों के लिए घाटे का सौदा बना हुआ है। वहीं, पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने की नीति ने कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाल दिया है।
आगे क्या हो सकता है असर?
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में यह तेजी जारी रहती है और घरेलू स्तर पर कीमतों में संशोधन नहीं किया जाता, तो तेल कंपनियों का घाटा और बढ़ सकता है। इससे भविष्य में ईंधन की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी या सरकारी हस्तक्षेप की संभावना भी बढ़ सकती है।
कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में भारत की तेल कंपनियां दोहरी चुनौती का सामना कर रही हैं—एक तरफ वैश्विक कीमतों का दबाव और दूसरी तरफ घरेलू स्तर पर कीमतों को स्थिर रखने की मजबूरी।

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