ईरान ने अमेरिका और इजरायल के साथ जारी संघर्ष के बीच अस्थायी युद्धविराम (सीजफायर) के प्रस्ताव को सख्ती से खारिज कर दिया है। सोमवार को ईरान ने मध्यस्थों के जरिए मिले इस प्रस्ताव पर अपनी स्पष्ट प्रतिक्रिया देते हुए न सिर्फ इसे अस्वीकार किया, बल्कि बातचीत के लिए अपनी शर्तें भी तय कर दीं। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब क्षेत्र में जारी तनाव को कम करने के लिए नए सिरे से कूटनीतिक प्रयास तेज हो रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच दुश्मनी को खत्म करने के उद्देश्य से एक प्रस्ताव तैयार किया गया था, जिसे सोमवार से लागू किए जाने की संभावना जताई जा रही थी। हालांकि, तेहरान ने इस पहल को ठुकराते हुए साफ कर दिया कि वह मौजूदा शर्तों पर किसी भी तरह का युद्धविराम स्वीकार नहीं करेगा।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि तेहरान पहले ही मध्यस्थ चैनलों के माध्यम से अपनी आवश्यकताएं और अपेक्षाएं स्पष्ट कर चुका था। उन्होंने बताया कि अमेरिका की ओर से पहले जो प्रस्ताव भेजे गए थे, वे पूरी तरह अस्वीकार्य हैं। इनमें पाकिस्तान के जरिए भेजा गया 15-सूत्रीय प्रस्ताव भी शामिल था, जिसे ईरान ने “असामान्य” और “अतार्किक” करार दिया।
बगाई ने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत का ईरान का पिछला अनुभव काफी कड़वा रहा है, इसलिए वह अब किसी भी समझौते को लेकर बेहद सतर्क है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान अपनी वैध मांगों को रखने में हिचकिचाता नहीं है और इसे कमजोरी या समझौते के संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह उसकी मजबूत और स्पष्ट नीति को दर्शाता है।
सरकारी मीडिया के अनुसार, ईरान ने पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को अपना आधिकारिक जवाब भेज दिया है। इस जवाब में ईरान ने न केवल युद्धविराम को अस्वीकार किया, बल्कि स्थायी समाधान की आवश्यकता पर भी बल दिया है। ईरान का मानना है कि केवल अस्थायी युद्धविराम से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

ईरान ने बातचीत के लिए 10 प्रमुख शर्तें भी सामने रखी हैं। इनमें क्षेत्रीय संघर्षों को समाप्त करना, होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित और निर्बाध आवागमन सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाना, ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना, युद्ध से प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण में सहयोग, और भविष्य में दोबारा हमले न होने की ठोस गारंटी शामिल है।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ओर से ईरान की इन शर्तों पर क्या प्रतिक्रिया आती है, और क्या कूटनीतिक प्रयास इस बढ़ते तनाव को कम करने में सफल हो पाएंगे।

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