डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर जेएनवीयू में विमर्श
जोधपुर। “भारत की राष्ट्रीय चेतना का मूल उसकी संस्कृति है, और उस संस्कृति की आत्मा नारी है।”—महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के पूर्व कुलगुरु एवं भारतीय राजनीति विज्ञान परिषद के महासचिव प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने यह बात जेएनवीयू में आयोजित व्याख्यान में कही। अवसर था, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के द्विवार्षिक समारोह और भारत सरकार के “स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार पखवाड़ा” अभियान का।
प्रो. शर्मा ने स्पष्ट किया कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद नारी को केवल गृहस्थी की संरक्षिका नहीं मानता, बल्कि राष्ट्र की संस्कृति और भविष्य की संवाहक मानता है। डॉ. मुखर्जी का विश्वास था कि जब तक नारी गरिमा सुरक्षित नहीं, तब तक राष्ट्र की एकता और विकास अधूरा है। आज “स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार पखवाड़ा” उसी विचार को जीवंत कर रहा है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. हीराराम ने कहा कि आज की भारतीय नारी विज्ञान से लेकर सेना तक, खेल से लेकर राजनीति तक, हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रही है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम और बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएँ इस सोच को आगे बढ़ाती हैं कि सशक्त नारी ही सशक्त राष्ट्र का आधार है।
राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. राम सिंह आढ़ा ने बताया कि यह आयोजन केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और राजस्थान युवा बोर्ड के निर्देशों पर शुरू हुई श्रृंखला का हिस्सा है, जिसमें आगे और भी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियाँ होंगी। महिला अध्ययन केंद्र की निदेशक डॉ. विजय श्री ने कहा कि भारतीय परंपरा ने सदैव नारी को ज्ञान, समृद्धि और शक्ति का प्रतीक माना है। “यदि नारी स्वस्थ है, तो परिवार सशक्त होगा और परिवार सशक्त होंगे तो राष्ट्र स्वतः सशक्त बनेगा”—यह डॉ. मुखर्जी की दृष्टि से भी पूर्णत: मेल खाता है।
व्याख्यान का संचालन डॉ. दिनेश कुमार गहलोत ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. विजय श्री ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी सम्मिलित हुए।


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