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यूजीसी के नए जातिगत नियमों पर सवाल, “समानता या सियासत?”—ज्ञापन में सामान्य वर्ग की चिंता उजागर

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भिवाड़ी। यूजीसी द्वारा प्रस्तावित नए जातिगत नियमों पर अब विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। इन नियमों को लेकर एक ज्ञापन प्रस्तुत किया गया है, जिसमें सरकार से पुनर्विचार की मांग की गई है। ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि नए बदलावों के तहत सामान्य वर्ग को पहले से संदेह के घेरे में खड़ा किया जा रहा है, जिससे कानून के दुरुपयोग की संभावना बढ़ रही है।

ज्ञापन में यह सवाल उठाया गया कि देश में पहले से ही भारतीय न्याय संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, एंटी-रैगिंग नियम और एससी/एसटी एक्ट जैसे सख्त कानून मौजूद हैं, तो फिर नए जातिगत नियमों की आवश्यकता क्यों पड़ी? ज्ञापन में कहा गया है कि यदि जातिगत भेदभाव एक गंभीर सामाजिक मुद्दा है, तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन निर्दोषों को भी कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।

ज्ञापन में यह भी दावा किया गया कि नए नियमों में ओबीसी वर्ग के खिलाफ कोई प्रावधान नहीं है, जबकि भेदभाव के मामले यहां भी सामने आते हैं। इसके अलावा, 2012 के पुराने नियमों में झूठे आरोप साबित होने पर जुर्माने का प्रावधान था, जिसे अब हटा लिया गया है।

आखिरकार, ज्ञापन में सरकार से यह अपील की गई है कि नए कानून समानता और संविधान की भावना पर आधारित हों, न कि राजनीतिक दृष्टिकोण से। इसके साथ ही यह भी मांग की गई है कि जांच समितियों में सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए, ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।

सरकार से यह अपेक्षा की गई है कि ऐसे कानूनों की बजाय, जो जातियों के बीच दीवारें खड़ी करें, एक ऐसा कानून लागू किया जाए जो समाज में न्याय और समानता को मजबूत करे।

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