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राजस्थान की राजनीति में ‘बागी’ नेता की पहचान बने हनुमान बेनीवाल

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राजस्थान की सियासत में एक नाम हमेशा सुर्खियों में रहता है — हनुमान बेनीवाल। किसान आंदोलन से लेकर सियासी बयानबाजी तक, वे हर मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखते हैं। हाल ही में, राजस्थान के इतिहास और राजाओं को लेकर दिए उनके विवादित बयान ने प्रदेश में राजनीतिक हलचल मचा दी। मगर, ये बयान सिर्फ उनके साहस और संघर्ष को ही उजागर करते हैं, जिन्होंने एक साधारण किसान परिवार से निकलकर राजस्थान की राजनीति में अहम स्थान बना लिया।

किसान परिवार से नेता तक का सफर

2 मार्च 1972 को नागौर जिले के बरनगांव गांव में जन्मे हनुमान बेनीवाल का बचपन एक साधारण जाट किसान परिवार में बीता। उनके पिता, रामदेव बेनीवाल, खुद एक सामाजिक कार्यकर्ता थे। घर का माहौल सादा था, लेकिन हनुमान के भीतर सामाजिक बदलाव की चाहत पिघल रही थी। राजस्थान विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी की पढ़ाई करने के बाद, 1997 में वे छात्रसंघ के अध्यक्ष बने। यह उनके राजनीतिक करियर की पहली महत्वपूर्ण छलांग थी, जहां उनकी बेबाकी और स्पष्टवादिता ने उन्हें युवाओं के बीच खास पहचान दिलाई।

भ्रष्टाचार के खिलाफ बगावत

शुरुआत में भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़े हनुमान बेनीवाल ने पार्टी में मौजूद भ्रष्टाचार और अंदरूनी संघर्षों के खिलाफ आवाज़ उठाई। 2013 में पार्टी से नाराज़ होकर उन्होंने BJP छोड़ दी और 2018 में अपनी पार्टी — राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) की स्थापना की। उनका उद्देश्य साफ था: किसानों, युवाओं और आम जनता की आवाज़ को एक नया मंच देना

किसानों के अधिकार के लिए संघर्ष

2008 में खींवसर विधानसभा सीट से विधायक बनने के बाद हनुमान बेनीवाल ने कभी भी किसान मुद्दों से मुंह नहीं मोड़ा। किसान आंदोलन के दौरान, वह दिल्ली बॉर्डर पर किसानों के साथ डटे रहे और MSP की कानूनी गारंटी और किसानों के हक के लिए संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष किया। उनकी रैलियों में भारी भीड़ उमड़ती है, क्योंकि वे वही बोलते हैं, जो जनता की सच्ची आवाज़ होती है।

राजनीतिक तेवर और गठबंधन के विवाद

राजस्थान की सियासत में बेनीवाल अपनी बेबाकी और साहस के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कभी भी बीजेपी, कांग्रेस, या अन्य दलों से डरकर कोई समझौता नहीं किया। फिलहाल वे कांग्रेस के साथ इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन कई बार उनके नाराजगी के तेवर सामने आ चुके हैं। कभी बैठकों में बुलाए न जाने पर तंज़, तो कभी उपचुनाव में गठबंधन न होने पर नाराज़गी — हनुमान बेनीवाल कभी भी किसी से हाँ में हाँ नहीं मिलाते। उनका कहना है, “मैं सत्ता के लिए नहीं, व्यवस्था बदलने के लिए राजनीति में आया हूँ।”

सादगी से भरा जीवन

राजनीति के साथ-साथ, हनुमान बेनीवाल का जीवन एक साधारण, सादगी भरे ढंग से जीने का है। उनकी पत्नी कांता बेनीवाल और दो बच्चे नागौर में रहते हैं। वे आज भी अपने क्षेत्र के लोगों से सीधा संवाद करते हैं और गांव-गांव जाकर उनकी समस्याएँ सुनते हैं। उनका कहना है, “राजनीति का उद्देश्य सिर्फ सत्ता पाना नहीं है, बल्कि समाज की बेहतरी के लिए काम करना है।”

बेनीवाल का प्रभाव

राजस्थान की राजनीति में हनुमान बेनीवाल की उपस्थिति एक ऐसा प्रभाव छोड़ चुकी है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। चाहे किसानों का हक हो, सामाजिक मुद्दे हों या फिर सियासी लड़ाइयाँ, हनुमान बेनीवाल ने हर मोर्चे पर अपनी स्थिति मजबूत की है। आज वे राजस्थान के एक ऐसे नेता माने जाते हैं, जो अपने इरादों में मजबूत हैं, और जो जब बोलते हैं, तो पूरा प्रदेश सुनता है।

राजस्थान की राजनीति में बदलाव की आहट

हनुमान बेनीवाल की नज़र सिर्फ सत्ता पर नहीं, बल्कि राजस्थान की सियासत में बदलाव लाने पर है। उनका नाम अब केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि किसानों के मसीहा, राजनीतिक बागी और बेबाक बयानबाज के तौर पर जाना जाता है। उनके तेवरों से यह साफ हो चुका है कि जब भी वह कुछ बोलते हैं, वह सियासत की दिशा को मोड़ सकते हैं। राजस्थान में उनके जैसे नेताओं की कमी नहीं, लेकिन हनुमान बेनीवाल की तरह बिना डर के सच बोलने वाला नेता, आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है।

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