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“जादूगर के बेटे अशोक गहलोत ने रचा इतिहास, बना राजस्थान का नेता”

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जोधपुर के महामंदिर गलियों से मुख्यमंत्री तक का सफर,”राजनीति में अपनी पहचान बनाने वाली असाधारण कहानी”

जोधपुर/ प्रेमाराम परिहार | राजस्थान की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं, जो सत्ता में रहें या विपक्ष में – उनकी मौजूदगी ही सियासी तराजू को झुका देती है। अशोक गहलोत ऐसा ही एक नाम है। कांग्रेस के ‘चाणक्य’ और ‘राजनीति के जादूगर’ के तौर पर पहचान बना चुके गहलोत | आज हम बात करने वाले हैं राजस्थान की सियासत के उस जादूगर की, जिसने राजनीति में ऐसे करतब दिखाए कि सब देखते रह गए। जी हां! बात हो रही है राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की — वो नेता, जो तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं, लेकिन आज भी दिल से वैसे ही सादगीभरे इंसान हैं।”

अशोक गहलोत का जन्म 3 मई 1951 को जोधपुर के महामंदिर इलाके में हुआ था। उनके पिता बाबु लक्ष्मण सिंह गहलोत पेशे से जादूगर थे, लेकिन बेटे ने राजनीति में ऐसा जादू चलाया कि हर कोई उनका मुरीद बन गया।

बचपन से ही गहलोत महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित रहे। कॉलेज के दिनों में समाजसेवा करने का जुनून इतना था कि वे कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई से जुड़ गए।

साल 1971 में जब भारत में पूर्वी बंगाल से शरणार्थी आए थे, गहलोत ने शिविरों में जाकर उनकी मदद की। वहीं उनकी मुलाकात हुई देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से, जिन्होंने उनकी मेहनत देखकर कहा – “इस लड़के में दम है!” और यहीं से शुरू हुआ उनका राजनीति का सफर।

धीरे-धीरे कांग्रेस में गहलोत का कद बढ़ता गया। कभी जोधपुर की सिटी कांग्रेस के अध्यक्ष बने, तो कभी प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष। फिर 1980 में पहली बार लोकसभा पहुंचे और उसके बाद तो उन्होंने मंत्रालयों की लाइन लगा दी — पर्यटन, खेल, वस्त्र, रेलवे… हर जगह काम से पहचान बनाई।

राजस्थान की जनता ने भी उन्हें खूब प्यार दिया। 1998 में पहली बार मुख्यमंत्री बने, 2008 में फिर वापसी की, और अब तीसरी बार भी सीएम की कुर्सी उन्हीं के पास है। तीन-तीन बार राज्य की बागडोर संभालना कोई छोटी बात नहीं होती दोस्तों!

राजनीति के पचास साल: एक युग की स्थापना

अशोक गहलोत ने राजनीति में अपने 50 साल पूरे कर लिए हैं। इस दौरान उन्होंने –

पांच बार सांसद

तीन बार केंद्र में मंत्री

तीन बार कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष

दो बार कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव

पांच बार विधायक

और तीन बार मुख्यमंत्री
जैसे मुकाम हासिल किए हैं।

कह सकते हैं कि राजस्थान में “अशोक गहलोत युग” बीते दशकों की राजनीति का एक स्थायी हिस्सा बन चुका है।

जाति समीकरणों से परे, सर्वमान्य नेता

राजनीतिक विशेषज्ञ बताते हैं की राजनीतिक तौर पर माली समाज से आने वाले गहलोत ने एक ऐसी सामाजिक पृष्ठभूमि से उठकर नेतृत्व किया, जिसकी व्यापक जनमान्यता राजस्थान की पारंपरिक जातीय राजनीति में दुर्लभ रही है। क्षत्रिय, जाट, ब्राह्मण जैसे प्रभावशाली वर्गों के बीच उन्होंने वंचित और शोषित वर्गों की आवाज बनकर अपने लिए अलग जगह बनाई।

उनकी सोच में समावेशिता है – यही वजह है कि वो हर वर्ग और समुदाय को साथ लेकर चलते हैं, और यही सोच उन्हें जननेता बनाती है।

राजनीति की रणनीति: विरोधियों की चाल उन्हीं पर भारी

गहलोत की राजनीति को समझना आसान नहीं। उनके फैसले शांत दिखते हैं, पर उनका असर तूफानी होता है।

1998 में 153 सीटों के बहुमत के बाद पहली बार सीएम बने अशोक गहलोत ने 2008 और 2018 में भी सत्ता में वापसी की। लेकिन ये रास्ता सीधा नहीं था – विरोधियों के साथ-साथ पार्टी के अंदर भी चुनौतियाँ रहीं।

2020 का पायलट प्रकरण इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जहां उनकी राजनीतिक सूझबूझ और पकड़ ने सरकार को संकट से बचा लिया।

गहलोत हमेशा कहते हैं — “राजनीति सत्ता नहीं, सेवा का रास्ता है।” यही वजह है कि वे आज भी आम लोगों के बीच उसी अपनापन के साथ रहते हैं। साधारण पहनावा, सीधी बात, और हर वक्त जनता के काम में लगे रहना, 74 की उम्र पार कर चुके गहलोत जब लोगों के बीच जाते हैं तो उनकी ऊर्जा, उनकी अपील और जनता से जुड़ाव फिर से उन्हें ‘युवा नेता’ बना देता है। — यही है अशोक गहलोत की असली पहचान।

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