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जीवन बचाने का संकल्प: मारवाड़ रक्त सेवा संस्थान जोधपुर

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जोधपुर| बदलते मौसम के साथ मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का प्रकोप हर तरफ बढ़ता जा रहा है। डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया और जीका वायरस जैसे रोग मरीजों को अचानक प्लेटलेट्स की कमी से जूझने पर मजबूर कर रहे हैं। कई बार हालात इतने गंभीर हो जाते हैं कि मरीज की जान सिर्फ समय पर मिलने वाले रक्त या प्लेटलेट्स पर टिकी होती है। ऐसे में मारवाड़ रक्त सेवा संस्थान रोजाना 2–3 जिंदगियों को नया जीवन देकर उम्मीद की किरण साबित हो रहा है।

संस्थान की निरंतर सक्रियता

संस्थान के अध्यक्ष बुधाराम सांखला कहते हैं— “हमारा प्रयास है कि कोई भी मरीज रक्त की कमी से दम न तोड़े। यही हमारी असली सेवा और संकल्प है।”
इसी सोच के साथ संस्थान हर दिन 3–4 एसडीपी डोनर्स को अलग-अलग ब्लड बैंकों में भेज रहा है। सचिव जसराज देवड़ा बताते हैं कि समय पर डोनर पहुंचाने की जिम्मेदारी सबसे कठिन है, लेकिन यही मानव जीवन बचाने का सबसे अहम साधन भी है।

हर दिन संस्थान से जुड़ी कहानियाँ यह साबित करती हैं कि रक्तदान केवल एक दान नहीं बल्कि जीवनदान है।

सर्पदंश पीड़ित रसूल कंवर – महात्मा गांधी अस्पताल, जोधपुर में भर्ती रसूल कंवर की हालत गंभीर थी। ए पॉजिटिव एसडीपी की तत्काल आवश्यकता थी। सूचना मिलते ही फौजी व नियमित रक्तदाता प्रदीप चौधरी रातों-रात अस्पताल पहुंचे और प्लेटलेट्स डोनेट कर उनकी जान बचाई।

कैंसर से जूझ रही रूक्मा देवी – मथुरादास माथुर अस्पताल में रूक्मा देवी की स्थिति बिगड़ रही थी। बी पॉजिटिव एसडीपी की तत्काल जरूरत थी। मुश्किल घड़ी में रक्तदाता सरकार अली केवल 15 मिनट में ब्लड बैंक पहुंचे और प्लेटलेट्स दान कर परिवार को राहत दी।

डेंगू पीड़ित स्वेता पारीक – महात्मा गांधी अस्पताल, जयपुर में स्वेता पारीक का जीवन बचाना एक चुनौती था। बी पॉजिटिव एसडीपी की सख्त जरूरत थी। बीकानेर से जुड़े बीकाणा जीवनदाता टीम और संस्थान की सक्रियता से रक्तदाता गोलू सैन व कार्यकर्ता घनश्याम सैन समय पर पहुंचे और महिला की जान बच गई।

संस्थान सिर्फ जोधपुर या मारवाड़ तक सीमित नहीं है। वर्तमान में यह अहमदाबाद, पुणे, जयपुर, हैदराबाद, पाली, अजमेर और अन्य बड़े शहरों में भी जरूरतमंद मरीजों तक रक्त पहुंचाने में सक्षम है। इस नेटवर्किंग के पीछे संस्थान के हजारों कार्यकर्ताओं और रक्तदाताओं की लगन और समर्पण है।
संस्थान की ओर से अब तक 135 रक्तदान शिविर आयोजित किए जा चुके हैं। फरवरी 2024 में संस्थान का औपचारिक पंजीकरण हुआ और उसके बाद से अब तक 15 कैंप आयोजित कराए गए हैं। वर्ष 2024 में ही संस्थान ने 500 से अधिक लाइव डोनर विभिन्न ब्लड बैंकों तक पहुंचाए।

एक भावुक शुरुआत की कहानी

मारवाड़ रक्त सेवा संस्थान की नींव 2015 में रखी गई। उस समय उम्मेद अस्पताल, जोधपुर में एक गर्भवती महिला की डिलीवरी होनी थी और अचानक ए पॉजिटिव फ्रेश ब्लड की आवश्यकता पड़ गई।उस घड़ी में महिला और उसका अजन्मा बच्चा जीवन-मृत्यु से जूझ रहे थे। लेबर रूम के बाहर खड़ी वृद्ध सासू रक्त के लिए रो रही थी। तभी वहां मौजूद एक युवा ने अपने परिचित के साथ मिलकर पहली बार रक्तदान किया। उस रक्तदान ने न केवल मां और बच्चे की जान बचाई बल्कि उस युवक के मन में समाज सेवा की चिंगारी भी जगा दी।वह युवक थे बुधाराम सांखला। उसी दिन से उन्होंने प्रण लिया कि रक्तदान के जरिए लोगों की जिंदगियां बचाई जाएंगी। इसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और हजारों लोगों को इस मुहिम से जोड़ते चले गए।

अब तक का योगदान, बना एक मिसाल
33 बार रक्तदान स्वयं अध्यक्ष बुधाराम सांखला द्वारा किया जा चुका है।संस्थान पंजीकरण के पूर्व 120 और बाद में 15 टोटल 135 शिविरों में हजारों यूनिट रक्त संग्रहित किया गया।अब तक हजारों मरीजों की जान बचाई जा चुकी है, जिनमें डेंगू पीड़ित, कैंसर पीड़ित, थैलेसीमिया से ग्रसित बच्चे, सर्पदंश पीड़ित और प्रसव पीड़ित महिलाएं शामिल हैं।

रक्तदाताओं के जज़्बे को सलाम
इन घटनाओं से यह साफ है कि रक्तदाता किसी भी रूप में गुमनाम हीरो हैं। वे न किसी पहचान के लिए आते हैं, न किसी सम्मान की उम्मीद रखते हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य सिर्फ इतना होता है कि कोई मरीज प्लेटलेट्स या रक्त की कमी से दम न तोड़े।संस्थान ने सभी रक्तदाताओं का हृदय से आभार जताया और समाज से आह्वान किया—
“रक्तदान सबसे बड़ा पुण्य है। यह सिर्फ इंसानियत की सेवा नहीं बल्कि जीवन बचाने का संकल्प है। आइए, ज्यादा से ज्यादा लोग इस मुहिम से जुड़ें और मानवता को सशक्त बनाएं।”

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