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Russian Oil: समुद्र में रूसी तेल टैंकरों का विशाल नेटवर्क फैला हुआ है, जहां से इच्छुक देश खुलकर खरीदारी कर रहे हैं। इसी के साथ रूस तेल निर्यात से लगातार ताबड़तोड़ कमाई कर रहा है। इस पूरे कारोबार में भारत का कनेक्शन भी अहम माना जा रहा है।

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Russian Oil Tankers: ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के बीच रूस सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर सामने आया है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण उसके लिए कमाई के नए रास्ते खुल गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बढ़ती कीमतों के चलते रूस को हर दिन करीब 15 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त कमाई हो रही है। इस बीच समुद्र में मौजूद उसके कई तेल से भरे कार्गो टैंकर भी खरीदारों के लिए उपलब्ध हो सकते हैं, जो वैश्विक बाजार में सप्लाई बढ़ा सकते हैं।

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच जारी टकराव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। इस पूरे घटनाक्रम में रूस सबसे बड़े आर्थिक लाभार्थियों में से एक बनकर उभरा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और सप्लाई में आई रुकावट के कारण रूस को तेल निर्यात से भारी फायदा हो रहा है। अनुमान है कि मौजूदा हालात में रूस हर दिन करीब  15 करोड़ डॉलर  तक की अतिरिक्त कमाई कर रहा है।

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Russian Oil Tankers: समुद्र में खड़े तेल से भरे कार्गो

दरअसल, इस समय समुद्र में रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों से लदे कई टैंकर मौजूद हैं। इनमें से कई जहाज अभी अपने अंतिम गंतव्य तक नहीं पहुंचे हैं और खरीदारों का इंतजार कर रहे हैं। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की ओर से दी गई अस्थायी छूट के बाद इन कार्गो को खरीदने का रास्ता खुल गया है। यह छूट उन शिपमेंट पर लागू होती है जिन्हें नए प्रतिबंध लागू होने से पहले ही जहाजों पर लाद दिया गया था।

ब्लूमबर्ग द्वारा तैयार जहाज-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार एशियाई जलक्षेत्र में लगभग  30 टैंकर रूसी कच्चा तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद लेकर मौजूद हैं। इन जहाजों में करीब  1.9 करोड़ बैरल कच्चा तेल  और लगभग  3.10 लाख टन रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद लदा हुआ है। वैश्विक बाजार में बढ़ती मांग और सप्लाई में अनिश्चितता के बीच ये कार्गो संभावित खरीदारों के लिए आकर्षक विकल्प बन सकते हैं।

25 जहाजों में अलग-अलग ग्रेड का रूसी तेल

समुद्र में मौजूद करीब  25 जहाज  अलग-अलग ग्रेड का रूसी कच्चा तेल लेकर चल रहे हैं। इनमें हल्का  ‘सोकोल’ कच्चा तेल भी शामिल है। कुछ टैंकर इस समय चीन के जलक्षेत्र के पास मौजूद हैं, जबकि कई जहाज अरब सागर में देखे गए हैं। इनमें से कई टैंकर “For Orders” का संकेत दे रहे हैं, जिसका मतलब होता है कि अभी उनके अंतिम खरीदार या गंतव्य का फैसला नहीं हुआ है।

कुछ जहाजों ने सिंगापुर और मलेशिया के बंदरगाहों को अपने अस्थायी गंतव्य के रूप में दिखाया है। आमतौर पर इन जगहों का इस्तेमाल तब किया जाता है जब कार्गो की मार्केटिंग या बिक्री की प्रक्रिया चल रही होती है और अंतिम खरीदार की तलाश जारी होती है।

 नैफ्था और डीजल भी कार्गो में शामिल

इन टैंकरों में केवल कच्चा तेल ही नहीं बल्कि कई तरह के रिफाइंड उत्पाद भी मौजूद हैं। इनमें प्रमुख रूप से  नैफ्था  शामिल है, जिसका इस्तेमाल प्लास्टिक निर्माण में कच्चे माल के रूप में किया जाता है। इसके अलावा कुछ जहाजों में  डीजल ईंधन भी मौजूद है। हाल के हफ्तों में इन उत्पादों की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव के कारण वैश्विक सप्लाई प्रभावित हुई है।

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 अमेरिका की छूट का क्या मतलब है?

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की ओर से दी गई  एक महीने की अस्थायी छूट  रिफाइनरियों को उस रूसी तेल को खरीदने की अनुमति देती है जिसे नए प्रतिबंध लागू होने से पहले जहाजों पर लाद दिया गया था। यह व्यवस्था पहले दी गई छूट का ही विस्तार है। इससे कई देशों के रिफाइनरों को सीमित रूप से रूसी तेल खरीदने का मौका मिल रहा है।

यह कदम ऐसे समय में आया है जब मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य के पास तनाव के कारण कई जहाज या तो फंस गए हैं या उन्हें वैकल्पिक मार्गों की ओर मोड़ दिया गया है।

 भारत का रूसी तेल कनेक्शन

इस पूरे मामले में भारत का कनेक्शन भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल की खरीद जारी रखी है। भारतीय रिफाइनरियां रूस से कच्चा तेल आयात कर देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती रही हैं।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका की अस्थायी छूट भारत और अन्य एशियाई देशों को कुछ समय के लिए राहत दे सकती है। इससे उन्हें सप्लाई में आई अचानक बाधाओं से निपटने और वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करने का मौका मिलेगा। चीन भी रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है और उसने भी रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदना जारी रखा है।

हालांकि जापान और दक्षिण कोरिया जैसे कुछ बड़े एशियाई आयातकों ने इन शिपमेंट से दूरी बनाए रखी है। लेकिन वैश्विक बाजार में बढ़ती कीमतों और सप्लाई संकट के कारण कई देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है।

कुल मिलाकर, मध्य पूर्व के बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल के बीच समुद्र में मौजूद रूसी तेल के ये टैंकर कई देशों के लिए अल्पकालिक राहत साबित हो सकते हैं। वहीं रूस के लिए यह स्थिति आर्थिक रूप से फायदेमंद बनती जा रही है क्योंकि बढ़ती कीमतों के साथ उसके तेल निर्यात से होने वाली कमाई लगातार बढ़ रही है।

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