बीकानेर/प्रेमाराम परिहार।अध्यात्म, तपस्या और सेवा की जीवंत प्रतिमूर्ति, सेंगाल धोरा स्थित प्राचीन शिव मंदिर के आचार्य एवं 10 नाम जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री महंत पदम गिरी महाराज रविवार सुबह ब्रह्ममुहूर्त में ब्रह्मलीन हो गए। 93 वर्ष की आयु में जोधपुर में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से बीकानेर संभाग ही नहीं, बल्कि पूरे देश के संत समाज और श्रद्धालुओं में गहरा शोक व्याप्त है।

अंतिम यात्रा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
महंत श्री की पार्थिव देह को जोधपुर से सेंगाल धोरा लाया गया। इस दौरान कक्कू, हंसासर सहित आसपास के कई गांवों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। जगह-जगह पुष्पवर्षा कर संत को अंतिम विदाई दी गई।
सेंगाल धोरा पहुंचने पर भव्य अंतिम यात्रा निकाली गई, जिसमें भजन-कीर्तन, ढोल-नगाड़ों और जयघोष के बीच सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए। “हर-हर महादेव” और “राम नाम सत्य है” के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
संतों के सानिध्य में पूर्ण वैदिक विधि-विधान के साथ मंदिर परिसर में समाधि दी गई। इस दौरान उपस्थित जनसमूह की आंखें नम हो गईं।

संत समाज और गणमान्य लोगों की रही उपस्थिति
इस भावुक अवसर पर कालाभाटा कुंड जांगलू के महंत जसवंत गिरी, रातड़िया धोरा के महंत श्याम गिरी, परमेश्वर गिरी, परशुराम गिरी, गोविंद गिरी, अलख गिरी, चवदस गिरी, रूपनाथ धूणा बिराई के महंत रामनिवास महाराज, कथा वाचक कैलाश गिरी महाराज सहित अनेक संत-महात्मा उपस्थित रहे।
इसके अलावा पूर्व सरपंच भूपेंद्र सिंह बिदावत, रामचंद्र सियाग, खियाराम सियाग, प्रशासक हेमेन्द्र कक्कू, नवरत्न शास्त्री दिनेश महाराज सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।

8 वर्ष की आयु में त्यागा राजसी जीवन
मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के पिपरिया तहसील के गजनई गांव में वर्ष 1933 में जन्मे महंत पदम गिरी महाराज का बचपन का नाम रविंद्र सिंह था। उनके पिता ठाकुर प्रहलाद सिंह चौहान 14 गांवों के जागीरदार थे।तथा माता गोमती कंवर ग्रहणी थी।
संपन्न परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने मात्र 8 वर्ष की आयु में वैराग्य धारण कर सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया। बचपन से ही उनका मन भक्ति और साधना में रमा रहा।
उन्होंने बीकानेर जिले के कक्कू क्षेत्र स्थित रूपनाथ मठ में महंत देवी गिरी महाराज से दीक्षा ली और गुरु आज्ञा का पालन करते हुए जीवनभर साधना, सेवा और समाज उत्थान को अपना लक्ष्य बनाया।

शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान
महंत पदम गिरी महाराज केवल संत ही नहीं, बल्कि शिक्षा के महान संरक्षक भी थे। उन्होंने वर्ष 1977 में संस्कृत विद्यापीठ की स्थापना की, जहां आज भी विद्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है।
इस विद्यापीठ में ज्योतिष, कर्मकांड, व्याकरण और साहित्य की शिक्षा दी जाती है तथा शास्त्री और आचार्य की उपाधि प्रदान की जाती है। देशभर से विद्यार्थी यहां अध्ययन करने आते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगी।
सेंगाल धोरा का किया अभूतपूर्व विकास
सेंगाल धोरा, जो कभी सीमित सुविधाओं वाला धार्मिक स्थल था, आज एक प्रमुख आध्यात्मिक और पर्यटन केंद्र बन चुका है—जिसका श्रेय महंत पदम गिरी महाराज को जाता है।

उन्होंने यहां आधुनिक शिव मंदिर, गोरखनाथ मंदिर, दत्तात्रेय मंदिर, रूपनाथजी महाराज मंदिर,पाबूजी महाराज का मंदिर, डेमो जी महाराज का मंदिर, देवल बाई का मंदिर, सहित एक दर्जन से अधिक मंदिरों का निर्माण कराया। साथ ही गौशाला, भोजनशाला, विद्यार्थियों के लिए हॉस्टल, सड़क, पानी और बिजली जैसी सुविधाएं भी विकसित कराईं।
उनके प्रयासों से पानी की किल्लत दूर हुई और क्षेत्र में स्थायी जल व्यवस्था स्थापित हुई। आज सेंगाल धोरा राजस्थान ही नहीं, बल्कि देशभर में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के रूप में पहचान बना चुका है।

33 वर्षों तक रहे मठाधीश, 13वें गादीपति
महंत पदम गिरी महाराज सेंगाल धोरा के 13वें मठाधीश थे। उन्होंने लगभग 33 वर्षों तक इस पद पर रहते हुए मठ की सेवा की और इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
उनकी दूरदर्शिता, संगठन क्षमता और आध्यात्मिक नेतृत्व ने सेंगाल धाम को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।
जूना अखाड़ा में अंतरराष्ट्रीय महामंत्री
वर्ष 2016 में काशी स्थित 10 नाम जूना अखाड़ा में उन्हें निर्विरोध अंतरराष्ट्रीय महामंत्री चुना गया। यह उनके प्रति संत समाज के विश्वास और सम्मान का प्रतीक था।

अपूरणीय क्षति, सदैव प्रेरणास्रोत रहेंगे
महंत पदम गिरी महाराज का संपूर्ण जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और धर्म प्रचार को समर्पित रहा। उन्होंने सनातन संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके ब्रह्मलीन होने से संत समाज और श्रद्धालुओं को अपूरणीय क्षति हुई है। उनका जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।

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