एनडीटीवी के मुताबिक, मुखर्जी ने बताया कि यह कोई छोटी घटना नहीं है। यह तेल और हार्मुज के लिए संघर्ष है। यह रणनीतिक शक्ति के लिए लड़ाई है। और दुर्भाग्य से यह जल्दी खत्म होने वाली नहीं है। हार्मुज पर नियंत्रण की यह जंग कई महीनों तक चलती रहेगी।

चीन की तेल रणनीति
कार्नेगी मिडिल ईस्ट के विशेषज्ञ अब्दुल्लाह बाबूद का भी यही मानना है। उन्होंने कहा कि खाड़ी क्षेत्र से आने वाले तेल पर चीन की निर्भरता अब धीरे-धीरे रणनीतिक महत्वाकांक्षा में बदल चुकी है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक बन चुका है। ऐसे में हार्मुज से तेल की निर्बाध आपूर्ति उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी हो गई है।
चीन पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार कर ईरान से बहुत सस्ता तेल खरीद रहा है। 2021 में दोनों देशों के बीच 25 साल का सामरिक साझेदारी समझौता हुआ था, जिसमें सस्ते तेल के बदले चीन ने ईरान में बड़े पैमाने पर निवेश किया। अब दोनों के बीच सैन्य सहयोग की भी संभावनाएं बढ़ रही हैं।
खाड़ी क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव
चीन ने खाड़ी क्षेत्र में अपना दबदबा और बढ़ाया है। उसने संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, ईरान और पाकिस्तान में अरबों डॉलर के बंदरगाहों में निवेश किया है। साथ ही पाइपलाइन और रेल नेटवर्क बनाकर व्यापार को मजबूत किया है, ताकि हार्मुज पर निर्भरता कम हो सके।
अभी चीन के पास अमेरिका जितनी सैन्य ताकत तो नहीं है, लेकिन अमेरिका की क्षेत्र में कम होती भागीदारी और खाड़ी देशों की दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन की कोशिशें चीन को अपना प्रभाव बढ़ाने का मौका दे रही हैं।

भारत पर क्या पड़ेगा गंभीर असर
इस पूरे संकट का सबसे तत्काल और गंभीर असर भारत पर पड़ने वाला है। सौरभ मुखर्जी ने चेतावनी दी कि संघर्ष शुरू होने से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था परेशानी में थी। अब हमें महंगे तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती ब्याज दरों के साथ काम करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि घरेलू खपत की कहानी अब चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।
कमजोर सफेदपोश नौकरियों का सृजन, बढ़ता कर्ज और उपभोक्ता मांग में कमी से कंपनियों के मुनाफे (EPS) पर कटौती हो सकती है और बाजार मूल्यांकन पर सवाल उठ सकते हैं।

Leave a Reply