डाकुओं से लोहा लेने वाले वीर योद्धा, 19 वर्ष तक सरपंच, 21 खेड़ा जाट समाज के आजीवन अध्यक्ष और जनसेवा के पर्याय रहे “राजा” लिखमाराम

PRP NEWS/सालवा कलां/ जोधपुर।सालवा कलां के पूर्व सरपंच एवं जनसेवा के पर्याय रहे स्वर्गीय लिखमाराम कुकणा, जिन्हें पूरा क्षेत्र सम्मानपूर्वक “राजा” लिखमाराम के नाम से जानता है, का जीवन साहस, सादगी, ईमानदारी और निस्वार्थ सेवा का अनुपम उदाहरण रहा। उन्होंने अपने पूरे जीवन में समाज और क्षेत्र के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी तथा अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, विक्रम संवत 1991 को जन्मे लिखमाराम के पिता स्वर्गीय आशुराम कुकणा एवं माता स्वर्गीय चम्पा देवी थीं। चार भाइयों और तीन बहनों में सबसे छोटे लिखमाराम का विवाह स्वर्गीय मथुरा देवी से हुआ। उनके परिवार में तीन पुत्र— बाबूलाल ,भंवरसिंह, हुकमाराम तथा एक पुत्री केली देवी हैं। उनका देहावसान 28 अगस्त 2016 (भाद्रपद कृष्ण पक्ष एकादशी, विक्रम संवत 2073) को हुआ।

डाकुओं से दो घंटे तक लड़े, गांव की रक्षा की
10 फरवरी 1955 को कुख्यात डाकू खानू राईका, कल्याणसिंह एवं रावल ने सालवा कलां पर हमला कर दिया। उस समय लिखमाराम ने कलजी भील के साथ मिलकर अदम्य साहस का परिचय दिया। मात्र तीन बंदूकों के सहारे लगभग दो घंटे तक डाकुओं का मुकाबला किया और उन्हें घायल कर गांव से खदेड़ दिया। इसी दौरान उन्होंने शिवजीराम हरकुट सेठ को भी डाकुओं के चंगुल से सुरक्षित मुक्त कराया।
पुलिस सेवा का मिला अवसर
वीरता से प्रभावित होकर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वर्गीय ताराचन्द चौधरी ने उन्हें पुलिस सेवा में भर्ती होने का प्रस्ताव दिया। लिखमाराम ने देश सेवा की भावना से इसे स्वीकार किया और एएसआई (ASI) के रूप में सेवा शुरू की। हालांकि, पुलिस अधीक्षक की वीरगति के बाद पिता की इच्छा पर उन्होंने रेलवे विभाग में इलेक्ट्रीशियन के रूप में कार्य किया, लेकिन उनका मन हमेशा समाज सेवा में ही लगा रहा।
राजनीति और जनसेवा में बनाया अलग मुकाम
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़कर उन्होंने स्वर्गीय परसराम मदेरणा के साथ किसान आंदोलन को मजबूत किया। वर्ष 1960 से 1979 तक लगातार 19 वर्षों तक सरपंच रहते हुए गांव में विद्यालय, पानी की टंकी, सड़कें सहित अनेक विकास कार्य करवाए। वर्ष 1995 में जनता के आग्रह पर पुनः सरपंच निर्वाचित हुए और विकास कार्यों को नई गति दी।

“राजा” की उपाधि से हुए सम्मानित
वर्ष 1971 में रातड़ी किसान सम्मेलन के दौरान स्वर्गीय परसराम मदेरणा एवं स्वर्गीय नाथूराम मिर्धा ने उनके त्याग, नेतृत्व और जनसेवा से प्रभावित होकर सार्वजनिक मंच से उन्हें “राजा” की उपाधि से सम्मानित किया। इसके बाद वे पूरे क्षेत्र में “राजा” लिखमाराम के नाम से प्रसिद्ध हुए।
समाज सेवा में भी निभाई अग्रणी भूमिका
उन्होंने सहकारी समिति मण्डोर, दूध डेयरी, ब्लॉक अध्यक्ष एवं कांग्रेस कमेटी मण्डोर के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। वर्ष 1992 से 2016 तक लगातार 24 वर्षों तक 21 खेड़ा जाट समाज के आजीवन अध्यक्ष रहते हुए समाज में शिक्षा, एकता और सामाजिक उत्थान के लिए उल्लेखनीय कार्य किए।
प्रेरणा बनकर अमर रहेंगे “राजा” लिखमाराम

स्वर्गीय लिखमाराम कुकणा का संपूर्ण जीवन ईमानदारी, साहस, सादगी, त्याग और जनसेवा की मिसाल रहा। उनके आदर्श, सिद्धांत और समाज के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। उनका योगदान सालवा कलां ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज रहेगा।

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