जैव विविधता दिवस पर विशेष : जोधपुर का पत्थर सिर्फ खूबसूरती नहीं, 75 करोड़ साल पुरानी धरती की कहानी है
कभी ज्वालामुखियों से दहकता था जोधपुर, फिर समुद्र की रेत ने लिखी नई इबारत; मेहरानगढ़ से उम्मेद भवन तक चट्टानों में छिपा है भू-इतिहास
प्रेमाराम परिहार/PRP NEWS/ जोधपुर।जोधपुर को दुनिया आज ‘ब्लू सिटी’ के नाम से जानती है। मेहरानगढ़ का विशाल किला, उम्मेद भवन की भव्यता, पुराने शहर की नीली हवेलियां और लाल-भूरे पहाड़ इसकी पहचान हैं। लेकिन इन ऐतिहासिक इमारतों और चट्टानों की खूबसूरती के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है, जो मानव सभ्यता से नहीं, बल्कि करोड़ों साल पुरानी पृथ्वी की भूगर्भीय यात्रा से जुड़ी है।
जोधपुर की धरती करीब 75 करोड़ वर्ष पुराने भूगर्भीय घटनाक्रमों की गवाह रही है। उस दौर में यहां बड़े पैमाने पर ज्वालामुखीय गतिविधियां हुईं। लावा और ज्वालामुखीय पदार्थ ठंडे होकर चट्टानों में बदलते गए। इसके करोड़ों साल बाद इस क्षेत्र में समुद्र और जलधाराओं का प्रभाव आया तथा रेत और तलछट की परतें जमा होती गईं। इन्हीं भूगर्भीय प्रक्रियाओं ने आगे चलकर उस चट्टानी परिदृश्य को जन्म दिया, जिसे आज हम जोधपुर की पहचान के रूप में देखते हैं।

डायनासोर से भी करोड़ों साल पुरानी कहानी
जोधपुर की भू-विरासत की सबसे खास बात यह है कि इसका एक बड़ा हिस्सा उस समय का है, जब पृथ्वी पर डायनासोर का अस्तित्व भी नहीं था।
भू-विज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार प्राचीन महाद्वीप रोडिनिया के विखंडन के दौरान इस क्षेत्र में व्यापक ज्वालामुखीय गतिविधियां हुईं। इस दौरान निकला लावा ठंडा होकर विभिन्न आग्नेय चट्टानों में बदल गया। बाद के भूगर्भीय काल में समुद्र और नदियों से आई रेत व तलछट इन पुरानी चट्टानों के ऊपर जमा होती गई।
इस तरह जोधपुर की धरती पर अलग-अलग भूगर्भीय कालखंडों की चट्टानों की परतें दिखाई देती हैं।
मेहरानगढ़ की तलहटी में दिखता है दो भू-युगों का मिलन
जोधपुर की भू-विरासत का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र मेहरानगढ़ की चिड़ियाटूंक पहाड़ी और आसपास का क्षेत्र माना जाता है। यहां मालानी इग्नियस सुइट और मारवाड़ सुपरग्रुप की चट्टानों का संपर्क भू-विज्ञान की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
एक ओर प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधियों से बनी आग्नेय चट्टानें हैं, तो दूसरी ओर बाद के काल में जमा हुई तलछटी चट्टानों की परतें। इन दोनों के बीच का संपर्क यह समझने में मदद करता है कि किस तरह एक क्षेत्र ने ज्वालामुखीय गतिविधियों से लेकर समुद्री और तलछटी वातावरण तक का लंबा भूगर्भीय सफर तय किया।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी GSI ने जोधपुर क्षेत्र की इसी विशिष्ट भू-विरासत को महत्व देते हुए यहां महत्वपूर्ण भू-विरासत स्थलों को राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित पहचान दी है।

वेल्डेड टफ—ज्वालामुखी के विस्फोट का सीधा प्रमाण
मेहरानगढ़ रिज क्षेत्र में मिलने वाली वेल्डेड टफ (Welded Tuff) भी जोधपुर के प्राचीन ज्वालामुखीय इतिहास का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान अत्यधिक गर्म राख, कांच जैसे सूक्ष्म कण और खनिज पदार्थ वातावरण में फैलते हैं। जब यह पदार्थ अत्यधिक तापमान और दबाव के प्रभाव में आपस में जुड़कर ठोस चट्टान का रूप लेता है, तो वेल्डेड टफ जैसी चट्टान बनती है।

PRP News/वेल्डेड टफ (Welded Tuff)
यानी मेहरानगढ़ की चट्टानों को केवल किले की नींव या पहाड़ी का हिस्सा समझना अधूरा होगा। इनमें उस समय की भूगर्भीय घटनाओं के प्रमाण सुरक्षित हैं, जब इस क्षेत्र में ज्वालामुखीय गतिविधियां सक्रिय थीं।
विशेषज्ञ की नजर में जोधपुर की भू-विरासत
डॉ. हुकमाराम चौहान असिस्टेंट प्रोफेसर (गेस्ट फैकल्टी), जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर(भू-विज्ञान विभाग)
जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर (गेस्ट फैकल्टी) डॉ. हुकमाराम चौहान के अनुसार जोधपुर की चट्टानें पृथ्वी के अत्यंत प्राचीन इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
डॉ. चौहान बताते हैं कि करीब 75 करोड़ वर्ष पहले इस क्षेत्र मेंबड़े पैमाने पर ज्वालामुखीय गतिविधियां हुई थीं। उस समय निकला लावा ठंडा होकर आग्नेय चट्टानों में परिवर्तित हुआ। इसके करोड़ों साल बाद परिस्थितियां बदलीं और समुद्र तथा जलधाराओं के माध्यम से रेत और तलछट यहां जमा हुई। यही कारण है कि मेहरानगढ़ क्षेत्र में अलग-अलग भूगर्भीय कालखंडों की चट्टानों का संपर्क देखने को मिलता है।
उनके अनुसार रोडिनिया के विखंडन के दौरान हुई भूगर्भीय हलचलों को समझने में भी जोधपुर क्षेत्र की चट्टानें महत्वपूर्ण संकेत देती हैं। यह वह दौर था, जब पृथ्वी का स्वरूप आज से पूरी तरह अलग था और जीव-जगत का विकास भी वर्तमान स्वरूप में नहीं पहुंचा था।
छीतर पत्थर में भी दर्ज है जोधपुर का भू-इतिहास
जोधपुर का प्रसिद्ध छीतर पत्थर भी शहर की भू-विरासत से जुड़ी महत्वपूर्ण कड़ी है। उम्मेद भवन सहित कई ऐतिहासिक इमारतों में इस्तेमाल हुआ यह पत्थर जोधपुर की स्थापत्य पहचान का हिस्सा बन चुका है।
शहर में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न प्रकार की चट्टानों को केवल निर्माण सामग्री के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इनकी संरचना और निर्माण प्रक्रिया जोधपुर के लंबे भूगर्भीय इतिहास से जुड़ी है।
जोधपुर की धरती पर आग्नेय चट्टानों के निर्माण के बाद भूगर्भीय परिस्थितियों में बदलाव आया और बाद के काल में तलछटी चट्टानों का निर्माण हुआ। यही विविधता आज मेहरानगढ़ और आसपास के क्षेत्र को भू-विज्ञान की दृष्टि से खास बनाती है।
मेहरानगढ़ सिर्फ किला नहीं, खुली भू-विज्ञान की किताब
मेहरानगढ़ आने वाले पर्यटक आमतौर पर किले की स्थापत्य कला, इतिहास और मारवाड़ की संस्कृति को देखने आते हैं। लेकिन किले के नीचे और आसपास मौजूद चट्टानें उससे भी कहीं पुरानी कहानी कहती हैं।
एक तरफ मानव इतिहास की सदियों पुरानी विरासत है और दूसरी तरफ पृथ्वी के करोड़ों वर्ष पुराने भूगर्भीय इतिहास के प्रमाण।
यदि इन चट्टानों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाते हुए पर्यटकों के लिए भू-विरासत ट्रेल, सूचना पट्ट और जियो-टूरिज्म गतिविधियां विकसित की जाएं तो जोधपुर पर्यटन को एक नया आयाम मिल सकता है।
यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क की दिशा में प्रयास
मेहरानगढ़ रिज को यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क की दिशा में पहचान दिलाने के लिए शोध और प्रयास किए जा रहे हैं। यदि भविष्य में यह पहल सफल होती है, तो जोधपुर की पहचान केवल ऐतिहासिक किले, महलों और संस्कृति तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह दुनिया के महत्वपूर्ण भू-विरासत स्थलों में भी अपनी जगह बना सकता है।
इससे विद्यार्थियों, भू-विज्ञान शोधकर्ताओं और देश-विदेश के पर्यटकों के लिए जोधपुर एक महत्वपूर्ण जियो-टूरिज्म डेस्टिनेशन बन सकता है।
75 करोड़ साल की यात्रा—एक नजर में
लगभग 75 करोड़ वर्ष पहले: क्षेत्र में व्यापक ज्वालामुखीय गतिविधियां हुईं और लावा ठंडा होकर आग्नेय चट्टानों में बदला।
इसके करोड़ों साल बाद: भूगर्भीय परिस्थितियां बदलीं और समुद्र तथा जलधाराओं का प्रभाव क्षेत्र में पहुंचा।
इसके बाद: रेत और तलछट की परतें जमा हुईं, जिनसे बलुआ पत्थर जैसी चट्टानों का निर्माण हुआ।
आज: इन्हीं अलग-अलग भूगर्भीय कालखंडों की चट्टानें मेहरानगढ़ और जोधपुर के आसपास भू-विरासत का जीवंत दस्तावेज बनी हुई हैं।
जैव विविधता दिवस पर संदेश
जैव विविधता केवल पेड़-पौधों, वन्यजीवों और जीव-जंतुओं तक सीमित नहीं है। किसी क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान में उसकी भू-विविधता और भू-विरासत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जोधपुर की चट्टानें हमें यह याद दिलाती हैं कि प्रकृति ने इस धरती को आज के रूप में पहुंचाने में करोड़ों वर्ष लगाए हैं। इसलिए मेहरानगढ़ की पहाड़ियों, चट्टानों और प्राकृतिक भू-आकृतियों का संरक्षण केवल पत्थरों का संरक्षण नहीं, बल्कि पृथ्वी के इतिहास की एक जीवित किताब को सुरक्षित रखना है।

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