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भारत का सख्त संदेश: ईरान मध्यस्थता पर एस. जयशंकर बोले – “भारत किसी का दलाल नहीं”

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मिडिल ईस्ट संकट पर भारत का सख्त रुख: एस. जयशंकर ने पाकिस्तान की मध्यस्थता कोशिशों को बताया ‘बिचौलियापन’

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मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया है। राजधानी दिल्ली में आयोजित सर्वदलीय बैठक में भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने पाकिस्तान की भूमिका पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत किसी भी तरह का “बिचौलिया” बनने में विश्वास नहीं रखता। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के आधार पर काम करता है और Pakistan की तरह किसी के इशारों पर नहीं चलता।

सूत्रों के मुताबिक, बैठक में मौजूद नेताओं को संबोधित करते हुए जयशंकर ने पाकिस्तान को “दलाल राष्ट्र” करार देते हुए उसकी मध्यस्थता की कोशिशों की आलोचना की। उनका कहना था कि भारत की वैश्विक पहचान एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में है, जो शांति और स्थिरता के लिए काम करती है, न कि पर्दे के पीछे संदेशवाहक बनने के लिए।

दरअसल, मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के दौरान United States द्वारा Iran तक संदेश पहुंचाने के लिए पाकिस्तान और Turkey को माध्यम बनाने की खबरें सामने आई थीं। इन रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच एक अनौपचारिक संचार चैनल की भूमिका निभा रहा था, जिसे भारत ने अनुचित और अस्थिरता बढ़ाने वाला कदम बताया।

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वहीं, अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने पाकिस्तान और तुर्किए के माध्यम से आए अमेरिकी प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। ईरान ने स्पष्ट किया कि वह किसी तीसरे देश के जरिए वार्ता करने के बजाय सीधे बातचीत को प्राथमिकता देता है। इसके साथ ही ईरान ने अमेरिका के सामने पांच प्रमुख शर्तें भी रखी हैं।

इन शर्तों में सबसे अहम मांग Strait of Hormuz पर पूर्ण नियंत्रण की है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। इसके अलावा क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों में ढील और संप्रभुता के सम्मान जैसे मुद्दे भी ईरान की प्राथमिकताओं में शामिल हैं।

भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में संतुलित लेकिन स्पष्ट संदेश दिया है कि वह किसी भी प्रकार की गुप्त या परोक्ष मध्यस्थता का हिस्सा नहीं बनेगा। भारत का मानना है कि मिडिल ईस्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में स्थायी समाधान केवल पारदर्शी और प्रत्यक्ष संवाद से ही संभव है।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत की स्वतंत्र और सशक्त विदेश नीति को उजागर किया है, जो वैश्विक मंच पर उसकी विश्वसनीयता को और मजबूत बनाती है।

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