इतिहास का वो भारतीय नायक, जिसे आज भी भगवान मानकर पूजता है चीन
भारत और चीन के बीच वर्तमान में कूटनीतिक और सीमा विवाद के चलते भले ही रिश्ते तनावपूर्ण नज़र आते हों, लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा सुनहरा और भावुक अध्याय भी दर्ज है, जो सीमाओं, राजनीति और कूटनीति से परे मानवता की अनूठी मिसाल पेश करता है। यह कहानी है महाराष्ट्र के एक ऐसे भारतीय डॉक्टर की, जिसने पराए देश में जाकर वहां के लोगों के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। आज भी चीन में इस शख्स के सम्मान में सिर झुकता है और उन्हें देवतातुल्य आदर दिया जाता है। इस महान नायक का नाम था—डॉक्टर द्वारकानाथ शांताराम कोटनीस।
महाराष्ट्र से युद्धग्रस्त चीन तक का सफर
डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस का जन्म 10 अक्टूबर 1910 को महाराष्ट्र के सोलापुर में हुआ था। मेधावी छात्र रहे कोटनीस ने मुंबई के प्रतिष्ठित ग्रांट मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा की पढ़ाई की और 1936 में एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। उस दौर में चीन बेहद गंभीर संकट और त्रासदी से जूझ रहा था। द्वितीय चीन-जापान युद्ध के कारण वहां भारी तबाही मची थी, लाखों सैनिक और आम नागरिक गंभीर रूप से घायल हो रहे थे। चीन के पास डॉक्टरों, दवाओं और चिकित्सा संसाधनों की भारी कमी थी।
ऐसे नाज़ुक दौर में भारत की ओर से पांच डॉक्टरों की एक मेडिकल टीम चीन की सहायता के लिए भेजने का निर्णय लिया गया। युवा और ऊर्जावान डॉ. कोटनीस भी इस मिशन का हिस्सा बने और सितंबर 1938 में चीन पहुंचे। भारत से विदा लेते वक्त शायद उन्हें भी यह आभास नहीं था कि चीन की यह धरती उनकी पूरी ज़िंदगी और नियति को हमेशा के लिए बदलने वाली है।

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जब भारतीय डॉक्टर बना ‘के दिहुआ’ और ‘ओल्ड के’
चीन की धरती पर कदम रखने के बाद डॉ. कोटनीस को स्थानीय भाषा में नया नाम दिया गया—‘के दिहुआ’ (Ke Dihua)। चीनी सैनिक और स्थानीय ग्रामीण उन्हें आदर और प्यार से ‘ओल्ड के’ कहकर बुलाने लगे। उन्होंने शुरुआती दौर में यानआन (Yan’an) में अपनी सेवाएं दीं और बाद में सीधे उत्तरी चीन के भीषण युद्ध क्षेत्र में चले गए।
वहां उन्हें आठवीं रूट आर्मी (Eighth Route Army) के जनरल अस्पताल के सर्जिकल विभाग की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। हालात बेहद विषम थे; न तो आधुनिक अस्पताल थे और न ही पर्याप्त दवाएं। युद्ध के मैदानों से रोज़ाना सैकड़ों लहूलुहान सैनिक आते थे। डॉ. कोटनीस ने बिना आराम किए लगातार 72-72 घंटे तक ऑपरेशन टेबल पर खड़े रहकर सर्जरी कीं।
उन्होंने केवल इलाज तक खुद को सीमित नहीं रखा। संसाधनों के अभाव में उन्होंने स्थानीय जड़ी-बूटियों और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को समझा, सर्जिकल तकनीकों को आसान बनाया और स्थानीय युवाओं व नर्सों को मेडिकल ट्रेनिंग दी, ताकि उनके बाद भी यह सेवा-कार्य निरंतर जारी रह सके।
युद्ध के बीच प्रेम और नियति का क्रूर प्रहार
डॉ. कोटनीस का चीन के साथ नाता केवल पेशेवर नहीं रहा, बल्कि उनकी निजी जिंदगी भी वहीं रच-बस गई। सेवा करते हुए उनका परिचय चीनी नर्स गुओ छिंगलान से हुआ। दोनों का समर्पण एक-दूसरे को भा गया और नवंबर 1941 में दोनों परिणय सूत्र में बंध गए। 23 अगस्त 1942 को उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ। दंपति ने बेटे का नाम रखा—‘यिनहुआ’, जिसमें ‘यिन’ का अर्थ भारत (यिंदू) और ‘हुआ’ का अर्थ चीन था—अर्थात दोनों संस्कृतियों का जीवंत संगम।
किंतु नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। लगातार युद्ध के तनाव, भयानक ठंड, नींद की भारी कमी और अत्यधिक शारीरिक थकावट ने डॉ. कोटनीस के शरीर को भीतर से तोड़ दिया। उन्हें मिर्गी के दौरे पड़ने लगे और अंततः 9 दिसंबर 1942 को, महज़ 32 वर्ष की अल्पायु में इस कर्मयोगी ने अंतिम सांस ली।
उनकी मृत्यु से पूरे चीन में शोक की लहर दौड़ गई। चीनी क्रांति के शीर्ष नेता माओ से-तुंग (Mao Zedong) ने बेहद भावुक होकर शोक व्यक्त किया और कहा कि “सेना ने अपना दाहिना हाथ और राष्ट्र ने एक सच्चा मित्र खो दिया है।”

डॉक्टर द्वारकानाथ शांताराम कोटनीस।
परिवार की त्रासदी और अमर विरासत
डॉ. कोटनीस के निधन के बाद उनके परिवार ने भी गहरा दुख झेला। उनके इकलौते बेटे यिनहुआ का भी 1967 में महज 24 वर्ष की उम्र में असामयिक निधन हो गया। उनकी पत्नी गुओ छिंगलान ने अपना पूरा जीवन डॉ. कोटनीस की स्मृतियों और भारत-चीन मैत्री को समर्पित कर दिया।
चीन ने डॉ. कोटनीस के इस सर्वोच्च बलिदान को कभी नहीं भुलाया:
- स्मारक और समाधि: शिजियाझुआंग (Shijiazhuang) में 1976 में उनके सम्मान में एक भव्य मेमोरियल हॉल बनाया गया। नॉर्थ चाइना मार्टियर्स मेमोरियल सिमेट्री में उनकी समाधि स्थित है, जहां हर वर्ष लोग सिर झुकाकर श्रद्धांजलि देते हैं।
- मेडिकल संस्थान: उनके नाम पर ‘शिजियाझुआंग के दिहुआ मेडिकल साइंस स्कूल’ संचालित है, जिससे अब तक 45,000 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी प्रशिक्षित होकर देश की सेवा कर चुके हैं।
- राजनयिक सम्मान: समय-समय पर चीनी राजनयिक और शीर्ष अधिकारी सोलापुर स्थित उनके पैतृक निवास और प्रतिमा पर शीश नवाने पहुंचते हैं।

डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस की कहानी दो देशों के राजनीतिक विवादों से कहीं ऊपर इंसानियत की वो अमर गाथा है, जो यह सिखाती है कि करुणा और सेवा की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। यही कारण है कि इतिहास चाहे जो करवट ले, एक भारतीय का नाम ड्रैगन के देश में हमेशा श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ गूंजता रहेगा।

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