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मिलों से सीमित आपूर्ति के चलते चीनी ₹600 प्रति क्विंटल महंगी, सरकार के अगले कदम पर टिकी नजरें

देशभर के थोक बाजारों में चीनी की कीमतों में जोरदार तेजी देखी जा रही है। पिछले एक सप्ताह के भीतर भारत में चीनी के एक्स-मिल भाव में करीब ₹600 प्रति क्विंटल का भारी उछाल दर्ज किया गया है। चीनी मिलों से बाजार में हो रही सीमित आपूर्ति और नए पेराई सत्र (2026-27) की शुरुआत में अपेक्षाकृत कम शुरुआती भंडार के कारण कीमतों पर लगातार ऊपर की ओर दबाव बना हुआ है।
वर्तमान में महाराष्ट्र में चीनी के भाव ₹5,000 प्रति क्विंटल के करीब पहुंच चुके हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में दरें ₹5,000 से ₹5,100 प्रति क्विंटल के स्तर तक जा पहुंची हैं। अलग-अलग उत्पादक क्षेत्रों में मांग, स्थानीय उपलब्धता और गुणवत्ता के आधार पर कीमतों में थोड़ा अंतर जरूर है, लेकिन समग्र रुख तेजी का ही है।

आपूर्ति की कमी या डिस्पैच में सुस्ती?

उद्योग विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि कीमतों में इस तेज उछाल की मुख्य वजह देश में चीनी की कुल उपलब्धता का खत्म होना नहीं, बल्कि मिलों द्वारा बाजार में तत्काल आपूर्ति जारी करने में हो रही देरी है।
मिलों के पास गोदामों में चीनी का स्टॉक मौजूद है, लेकिन बिक्री, बिलिंग और डिस्पैच में सुस्ती के कारण थोक व खुदरा मंडियों तक माल सीमित मात्रा में पहुंच रहा है। इसके साथ ही, सरकार ने कुछ मिलों के बिक्री विवरण और जीएसटी रिकॉर्ड में विसंगतियों को रेखांकित किया है। इसके चलते 9 अक्टूबर से मिलों में भौतिक सत्यापन तेज करने का फैसला लिया गया है ताकि घोषित और वास्तविक स्टॉक के अंतर को पकड़ा जा सके। संबंधित मिलों को 20 से 31 अगस्त की बिक्री का पूरा ब्योरा 10 अक्टूबर तक जमा कराने का निर्देश दिया गया है।
अधिकारियों के अनुसार, मिलों को कृत्रिम कमी पैदा करने के बजाय उचित दरों पर बाजार में लगातार आपूर्ति बनाए रखनी चाहिए।
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केंद्र सरकार के सख्त कदम और नियम

त्योहारी सीजन में उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाने के लिए केंद्र सरकार पहले ही कई नियामकीय कदम उठा चुकी है:
  • पाक्षिक कोटा व अनिवार्य उठाव: प्रत्येक मिल के लिए पखवाड़े का बिक्री कोटा तय है। अक्टूबर माह के लिए मिलों को 1 से 8 अक्टूबर के बीच अपने पाक्षिक कोटे का कम से कम 45% हिस्सा बेचना और उठाना अनिवार्य था, जबकि शेष कोटा 15 अक्टूबर तक पूरा करना है।
  • कानूनी कार्रवाई की चेतावनी: तय समय में बिक्री या उठाव न करने पर इसे ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955’ और ‘चीनी (नियंत्रण) आदेश, 2025’ का सीधा उल्लंघन माना जाएगा।
  • स्टॉक सीमा में बदलाव: 15 अक्टूबर से 30 नवंबर तक व्यापारियों के लिए स्टॉक रखने के नियम कड़े कर दिए गए हैं। सामान्य तौर पर अधिकतम स्टॉक सीमा 1,000 क्विंटल (रखने की अवधि अधिकतम 15 दिन) तय की गई है, जबकि असम, कोलकाता और इसके महानगरीय इलाकों के लिए यह सीमा 2,000 क्विंटल रखी गई है।

नए पेराई सत्र की तैयारी और किसानों की चिंताएं

अक्टूबर की शुरुआत में भारत के पास लगभग 35 से 37 लाख टन (LMT) का ओपनिंग स्टॉक था, जो घरेलू खपत के करीब 6 से 7 हफ्तों के लिए पर्याप्त है। बाजार में तरलता बढ़ाने के लिए नए पेराई सत्र को समय से शुरू करने की योजना बनाई गई है:
  1. महाराष्ट्र: 210 मिलों (104 सहकारी, 106 निजी) को लाइसेंस दिए गए हैं, जिनमें से अधिकांश 15 अक्टूबर से परिचालन शुरू करेंगी। कुछ मिलों ने पेराई शुरू भी कर दी है।
  2. उत्तर प्रदेश और कर्नाटक: उत्तर प्रदेश में मिलें 20 अक्टूबर के आसपास पेराई शुरू करने जा रही हैं, जबकि कर्नाटक में अभी काम शुरू होना बाकी है।
हालांकि, समय से पहले पेराई को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसान संगठनों ने आपत्ति जताई है। किसानों का तर्क है कि गन्ने की अपरिपक्व कटाई से रिकवरी प्रतिशत घटेगा और वजन में कमी आएगी, जिससे किसानों और मिलों दोनों को आर्थिक नुकसान होगा। इस मुद्दे पर केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रल्हाद जोशी ने 12 अक्टूबर को महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है, वहीं महाराष्ट्र के चीनी आयुक्त और सहकारिता मंत्री 14 अक्टूबर को किसान प्रतिनिधियों से चर्चा करेंगे।
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सरकार का दावा है कि घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि देश में कुल भंडार पर्याप्त है। आपूर्ति सुगम करने के लिए केंद्र ने 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है और अक्टूबर उत्पादन की बिक्री शर्तों में ढील दी है।
बावजूद इसके, अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के नई दिल्ली कार्यालय ने वर्ष 2026-27 में भारत का चीनी उत्पादन 2.95 करोड़ टन रहने का अनुमान लगाया है, जो पहले के 3.36 करोड़ टन के अनुमान से काफी कम है।
कारोबारियों के अनुसार, यदि मिलों से तत्काल उठाव तेज नहीं हुआ और सरकार ने अतिरिक्त कोटा जारी करके हस्तक्षेप नहीं किया, तो एक्स-मिल भाव 10% और बढ़कर ₹5,200 से ₹5,400 प्रति क्विंटल तक पहुंच सकते हैं। आगामी दिनों में बाजार की दिशा पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि मिलें कितनी तेजी से माल निकालती हैं और नई पेराई से ताजा चीनी कितनी जल्दी मंडियों में पहुंचती है।

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