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सरकार ने बदले CAFE नॉर्म्स: ऑटो कंपनियों को 5 साल में 16.7% तक बढ़ानी होगी कारों की माइलेज

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भारत में ऑटो सेक्टर के लिए नए CAFE नॉर्म्स: कारों की माइलेज में 16.7% सुधार अनिवार्य

देश में कार्बन उत्सर्जन घटाने और ईंधन की खपत कम करने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने ऑटोमोबाइल कंपनियों के लिए नए कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (CAFE) नॉर्म्स को आधिकारिक रूप से नोटिफाई कर दिया है। इन नए नियमों का मुख्य उद्देश्य देश में बिकने वाली पैसेंजर कारों की ईंधन दक्षता बढ़ाना और ऑटो सेक्टर को इलेक्ट्रिक, हाइब्रिड और वैकल्पिक ईंधन जैसी पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों की ओर तेजी से अग्रसर करना है।

कब से लागू होंगे नए नियम और क्या है समय-सीमा?

नए CAFE मानक 1 अप्रैल 2027 से पूरे देश में प्रभावी होंगे और 31 मार्च 2032 तक लागू रहेंगे। यह पांच साल की रणनीतिक रूपरेखा विशेष रूप से सभी नई पैसेंजर कारों (यात्री वाहनों) पर लागू होगी। इस पूरी अवधि के दौरान ऑटो कंपनियों को अपनी सभी कारों के संयुक्त औसत बेड़े (Fleet Average) की फ्यूल एफिशिएंसी में करीब 16.7% का सुधार दर्ज करना अनिवार्य होगा।

सख्त होंगे फ्यूल खपत के मानक

नए ढांचे के तहत ईंधन खपत के मापदंडों को सालाना आधार पर कड़ा किया जाएगा:
  • वित्त वर्ष 2027-28 का लक्ष्य: इस शुरुआती वर्ष में कंपनियों के बेड़े के लिए ईंधन खपत का बेंचमार्क 3.996 लीटर प्रति 100 किलोमीटर निर्धारित किया गया है।
  • वित्त वर्ष 2031-32 का लक्ष्य: पांचवें वर्ष के अंत तक इस बेंचमार्क को और कड़ा करके 3.3273 लीटर प्रति 100 किलोमीटर पर लाया जाएगा।
इस प्रकार, कारों को 100 किलोमीटर की दूरी तय करने में ईंधन की खपत को चरणबद्ध तरीके से कम करना होगा।
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रेफरेंस व्हीकल वेट में बदलाव

नियमों के फॉर्मूले में इस्तेमाल होने वाले ‘रेफरेंस व्हीकल वेट’ (Reference Vehicle Weight) को भी संशोधित किया गया है। इसे पहले के 1,082 किलोग्राम से बढ़ाकर अब 1,229 किलोग्राम कर दिया गया है।
इस संशोधन का सीधा प्रभाव वाहनों के वर्गीकरण और उनके लक्ष्यों पर पड़ेगा:
  1. हल्की गाड़ियां: छोटी और हल्की कारों के लिए तय लक्ष्यों को हासिल करना अपेक्षाकृत सुगम रहेगा।
  2. भारी गाड़ियां (SUVs व प्रीमियम कारें): अधिक वजन वाले भारी वाहनों के लिए उत्सर्जन और माइलेज के मानक अधिक सख्त होंगे, जिससे कंपनियों को इन गाड़ियों में अधिक उन्नत फ्यूल-सेविंग तकनीकें देनी होंगी।

EV और हाइब्रिड वाहनों को ‘सुपर क्रेडिट’ का लाभ

कंपनियों को कड़े मानकों को पूरा करने में लचीलापन देने के लिए सरकार ने मल्टी-टेक्नोलॉजी अप्रोच को अपनाया है। नए नियमों के अंतर्गत स्वच्छ ईंधन और एडवांस तकनीकों पर आधारित वाहनों को सुपर क्रेडिट (वॉल्यूम डेरोगेशन फैक्टर) का लाभ दिया जाएगा।
इसका फायदा उठाने वाली प्रमुख श्रेणियां:
  • बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल (BEV)
  • रेंज-एक्सटेंडेड इलेक्ट्रिक व्हीकल (REEV)
  • प्लग-इन हाइब्रिड व्हीकल (PHEV)
  • स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड व्हीकल
  • फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल
सुपर क्रेडिट सिस्टम के तहत, कंपनियों द्वारा बेची गई प्रत्येक जीरो-एमिशन या हाइब्रिड गाड़ी को गणना में सामान्य से अधिक वेटेज मिलेगा। इससे कंपनियां अपने पेट्रोल और डीजल मॉडल्स से होने वाले उच्च उत्सर्जन को आसानी से संतुलित कर सकेंगी और पूरे फ्लीट के लिए तय माइलेज लक्ष्य को समय पर हासिल कर पाएंगी।
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एथेनॉल, CBG और रिन्यूएबल ईंधनों को मिला बढ़ावा

नए CAFE फ्रेमवर्क में केवल इलेक्ट्रिक वाहनों पर निर्भर रहने के बजाय अन्य वैकल्पिक एवं कम-कार्बन ईंधनों को भी पूरी मान्यता दी गई है:
  • कार्बन न्यूट्रैलिटी फैक्टर: एथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल, बायोफ्यूल और कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) जैसे ईंधनों को बढ़ावा देने के लिए नियमों में ‘कार्बन न्यूट्रैलिटी फैक्टर’ शामिल किया गया है।
  • फ्यूल-सेविंग तकनीकों का विस्तार: माइलेज सुधारने और ऊर्जा बचाने वाली मान्य तकनीकों की सूची को 4 से बढ़ाकर 12 कर दिया गया है।
  • CO2 में सीधी छूट: वाहन में शामिल प्रत्येक प्रमाणित तकनीक के लिए कंपनियों को प्रति किलोमीटर 1 ग्राम CO2 की छूट मिलेगी। हालांकि, इसका दुरुपयोग रोकने के लिए अधिकतम सीमा 9 ग्राम CO2 प्रति किलोमीटर तय की गई है।

कंपनियों के लिए क्रेडिट बैंकिंग और राहत

ऑटो इंडस्ट्री की लागत और तकनीकी बदलावों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अनुपालन में कई सहूलियतें भी प्रदान की हैं। कंपनियों को सालाना आधार पर कड़े दबाव में रखने के बजाय 2 से 3 साल की अवधि में संयुक्त रूप से लक्ष्य पूरे करने की सुविधा दी गई है।
इसके अलावा, ‘क्रेडिट बैंकिंग’ का प्रावधान भी रखा गया है। यदि कोई कार निर्माता कंपनी किसी वर्ष में तय सीमा से अधिक माइलेज हासिल करती है या उत्सर्जन को लक्ष्य से भी नीचे ले आती है, तो उस अतिरिक्त प्रदर्शन को ‘क्रेडिट’ के रूप में जमा किया जा सकेगा। इस बचे हुए क्रेडिट का उपयोग कंपनी भविष्य के वर्षों में अपने लक्ष्यों की भरपाई के लिए कर सकेगी।

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