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भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग और एविएशन फ्यूल के लिए अमेरिकी मक्के के आयात की तैयारी

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भारत के जैव ईंधन बाजार पर टिकी अमेरिकी नजर

भारत के तेजी से विस्तार लेते हरित ऊर्जा और जैव ईंधन क्षेत्र में अपनी पैठ बनाने के लिए अमेरिकी अनाज उद्योग ने गंभीर प्रयास शुरू कर दिए हैं। मुख्य रूप से ध्यान एथेनॉल के उच्च मिश्रण स्तरों—विशेषकर E85—और विमानन क्षेत्र के लिए आवश्यक सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के उत्पादन पर केंद्रित है।
हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित ‘अमेरिका-भारत जैव ईंधन शिखर सम्मेलन’ में दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों और उद्योग विशेषज्ञों के बीच इस दिशा में रणनीतिक वार्ता हुई। यह सम्मेलन यूएस ग्रेन्स एंड बायोप्रोडक्ट्स काउंसिल और यूएस-इंडिया स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फोरम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया था। इस बैठक में भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों, कार्बन कटौती के लक्ष्यों और अमेरिकी मक्के (Corn) की आपूर्ति के तकनीकी व आर्थिक पहलुओं पर गहन मंथन हुआ।

E20 से आगे: उच्च मिश्रण और E85 का नया ढांचा

भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने (E20) का महत्वाकांक्षी लक्ष्य अपनी मूल समयसीमा (2030) से काफी पहले ही सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है। इस सफलता के बाद नीति निर्माताओं और उद्योग जगत का ध्यान अब इससे आगे के चरणों पर है।
सम्मेलन में पेश किए गए प्रस्ताव के तहत एक दोहरी रणनीति सुझाई गई है:
  • E20 के लिए घरेलू स्रोत: वर्तमान 20% मिश्रण लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारत पूरी तरह अपने घरेलू कृषि संसाधनों (गन्ना, चावल, और स्थानीय मक्का) पर निर्भर रहे, ताकि स्थानीय किसानों के हितों पर कोई आंच न आए।
  • उच्च मिश्रण के लिए आयात: फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFVs) के लिए आवश्यक E85 (85% एथेनॉल और 15% पेट्रोल) जैसे उच्च मिश्रण वाले ईंधनों के लिए अमेरिकी मक्के के आयात की अनुमति दी जाए।
अमेरिकी मक्के की पर्यावरण-अनुकूलता साबित करने के लिए यूएस ग्रेन्स काउंसिल ने भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP) को ‘लाइफ साइकिल असेसमेंट’ (LCA) अध्ययन का जिम्मा सौंपा है। इस अध्ययन का उद्देश्य यह प्रदर्शित करना है कि स्रोत देश या आनुवंशिक संशोधन (GM) पर विवाद करने के बजाय पूरे जीवन चक्र में होने वाले वास्तविक कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय लाभों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
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E85 की लागत और वाहन उद्योग की संभावनाएं

भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर अब बड़े पैमाने पर फ्लेक्स-फ्यूल इंजन विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। टोयोटा जैसी प्रमुख कंपनियां पहले ही फ्लेक्स-फ्यूल प्रोटोटाइप पेश कर चुकी हैं। हालांकि, इन वाहनों की वास्तविक सफलता किफायती ईंधन की उपलब्धता पर निर्भर करती है।
उद्योग विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि अमेरिकी मक्के के आयात पर सहमति बनती है, तो बड़े पैमाने पर उत्पादन के चलते E85 ईंधन की खुदरा कीमत घटकर ₹60 से ₹65 प्रति लीटर के बीच आ सकती है। पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में यह दर उपभोक्ताओं के लिए बेहद आकर्षक होगी, जिससे देश में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को तेजी से अपनाने का मार्ग प्रशस्त होगा।

विमानन क्षेत्र में SAF और ATJ तकनीक का विस्तार

सड़क परिवहन के अलावा, अमेरिकी उद्योग भारत के उड्डयन क्षेत्र को कार्बन-मुक्त बनाने के प्रयासों में भी बड़ी भूमिका तलाश रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एयरलाइंस के लिए शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन के कड़े नियम लागू हो रहे हैं, जिससे सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है।
इस क्षेत्र में मुख्य ध्यान अल्कोहल-टू-जेट (ATJ) तकनीक पर है। यह प्रक्रिया एथेनॉल को शोधित करके उच्च गुणवत्ता वाले जेट ईंधन में बदल देती है। भारत के पास पहले से ही एक मजबूत डिस्टिलरी नेटवर्क और आधुनिक उत्पादन इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है, जिसे मामूली तकनीकी अपग्रेड के जरिए SAF उत्पादन के अनुकूल बनाया जा सकता है। इसके लिए वैश्विक पूंजी निवेश, तकनीकी साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा प्रमाणन (Certifications) की आवश्यकता होगी।
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आयात की राह में प्रमुख चुनौतियां

अमेरिकी उद्योग की इस गहरी दिलचस्पी के बावजूद, भारत सरकार के लिए यह फैसला आसान नहीं है। नीतिगत स्तर पर कई जटिल रुकावटें हैं:
  1. घरेलू किसानों की सुरक्षा: भारत का कृषि क्षेत्र आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। सरकार यह सुनिश्चित किए बिना आयात की अनुमति नहीं दे सकती कि इससे स्थानीय मक्का उत्पादक किसानों की आय पर नकारात्मक असर न पड़े।
  2. जीएम (GM) फसलों पर कड़े प्रतिबंध: अमेरिका में उत्पादित अधिकांश मक्का आनुवंशिक रूप से संवर्धित (Genetically Modified) होता है। भारत में खाद्य और कृषि उत्पादों के संदर्भ में जीएम फसलों पर सख्त नियामक प्रतिबंध लागू हैं, जिन्हें शिथिल करना एक बड़ा नीतिगत कदम होगा।
  3. वैज्ञानिक और तकनीकी समीक्षा: सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि E20 से आगे किसी भी बड़े देशव्यापी कदम के लिए व्यापक तकनीकी, इंजन अनुकूलता और सुरक्षा परीक्षण आवश्यक होंगे।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखें तो जैसे-जैसे भारत की ऊर्जा मांग बढ़ेगी, घरेलू बायोमास की आपूर्ति पर दबाव आ सकता है। अमेरिकी उद्योग इसी अंतर (supply gap) को पाटने के लिए खुद को एक विश्वसनीय और लागत-प्रभावी साझेदार के रूप में स्थापित करने की तैयारी में जुटा है।

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