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टेक इंडस्ट्री का स्याह सच: जहां मोबाइल की बैटरी के लिए जान गंवाने को मजबूर हैं 6 साल के मासूम

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दुनिया का वो देश, जहां फोन की बैटरी के लिए जान दे रहे 6 साल के बच्चे; जानिए इसके पीछे की खौफनाक वजह
आज की डिजिटल दुनिया में स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक गाड़ियां हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। हम एक क्लिक पर पूरी दुनिया से जुड़ जाते हैं और चंद मिनटों में अपने गैजेट्स चार्ज कर घंटों इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी जेब में रखे फोन या सड़क पर दौड़ती इलेक्ट्रिक कार की बैटरी को ऊर्जा कहां से मिलती है? आधुनिक तकनीक की इस चमक-दमक के पीछे एक ऐसा काला सच छिपा है, जो इंसानियत को झकझोर कर रख देता है। यह कहानी है उस देश की, जहां नन्हे मासूमों का बचपन ज़मीन के सैकड़ों फीट नीचे घुटकर दम तोड़ रहा है।

कोबाल्ट का सबसे बड़ा केंद्र: डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो

आधुनिक रिचार्जेबल लिथियम-आयन बैटरियों को बनाने में सबसे अहम खनिज ‘कोबाल्ट’ (Cobalt) का इस्तेमाल होता है। यह बैटरी को स्थिरता और लंबी उम्र देता है। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले कुल कोबाल्ट का 70 फीसदी से भी ज्यादा उत्पादन अकेले मध्य अफ्रीका के देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) से होता है।
वैश्विक स्तर पर टेक कंपनियों और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए कांगो एक बेहद महत्वपूर्ण कड़ी है। इलेक्ट्रिक वाहनों और गैजेट्स की बढ़ती मांग के कारण यहाँ कोबाल्ट की खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुकी है। लेकिन इस तकनीकी क्रांति की सबसे भारी कीमत कांगो के गरीब और बेबस नागरिक, खासकर छोटे बच्चे चुका रहे हैं।
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जब 6 साल की उम्र में खिलौनों की जगह थामनी पड़ी कुदाल

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और रिपोर्ट्स के अनुसार, कांगो की अवैध और अनौपचारिक खदानों (Artisanal Mines) में 40 हजार से भी अधिक बच्चे काम करने को मजबूर हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई बच्चों की उम्र महज 6 से 7 साल होती है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में स्कूल की किताबें और खिलौने होने चाहिए, उस उम्र में वे भारी औजार, कुदाल और पत्थरों से भरी बोरियां उठाने को विवश हैं।
कांगो दुनिया के सबसे संसाधन-संपन्न देशों में से एक होने के बावजूद अत्यधिक गरीबी और भुखमरी से जूझ रहा है। जब परिवारों के पास दो वक्त की रोटी का कोई दूसरा साधन नहीं बचता, तो वे मजबूरी में अपने बच्चों को इन जानलेवा खदानों में भेज देते हैं। दिनभर 10 से 12 घंटे कमरतोड़ मेहनत करने के बाद इन बच्चों को एक डॉलर (लगभग 80 से 90 रुपये) से भी कम मजदूरी मिलती है।

अंधेरी सुरंगे और हर कदम पर मौत का साया

कांगो की अनौपचारिक खदानें किसी आधुनिक इंडस्ट्रियल साइट जैसी नहीं हैं। यहाँ सुरक्षा के कोई बुनियादी नियम लागू नहीं होते। बच्चे और मजदूर बिना किसी हेलमेट, जूते या सुरक्षा किट के संकरी, तंग और हाथ से खोदी गई अंधेरी सुरंगों में उतरते हैं।
ये सुरंगे इतनी कच्ची होती हैं कि इनके धंसने का खतरा हमेशा बना रहता है। हर साल कई मजदूर और मासूम बच्चे इन सुरंगों के ढहने से जिंदा दफन हो जाते हैं। जो बच्चे जमीन के ऊपर रहते हैं, वे दिनभर भारी पत्थरों को छांटने, धोने और ढोने का काम करते हैं, जो उनके छोटे और अविकसित शरीरों को गंभीर चोटों का शिकार बना देता है।

सांसों में घुलता धीमा जहर

खदानों में खतरा सिर्फ सुरंग ढहने का ही नहीं है, बल्कि उस हवा का भी है जिसमें ये बच्चे सांस लेते हैं। बिना किसी मास्क के काम करने की वजह से कोबाल्ट और अन्य भारी धातुओं की जहरीली धूल फेफड़ों में समा जाती है। इससे बच्चों में ‘हार्ड मेटल लंग डिजीज’, सांस की गंभीर बीमारियां और स्थायी अपंगता का खतरा पैदा हो जाता है। इसके अतिरिक्त, कांगो के कुछ खनन क्षेत्रों में यूरेनियम की मौजूदगी भी पाई जाती है, जिसके संपर्क में आने से रेडिएशन का खतरा बढ़ जाता है और आने वाली पीढ़ियां भी जन्मजात बीमारियों का शिकार हो रही हैं।

सप्लाई चेन का उलझा हुआ जाल

सवाल उठता है कि दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां इस बाल मजदूरी को रोक क्यों नहीं पातीं? दरअसल, इसकी सबसे बड़ी वजह कोबाल्ट की जटिल सप्लाई चेन है। अनौपचारिक खदानों से निकला कच्चा कोबाल्ट स्थानीय बिचौलियों के हाथों बेचा जाता है। ये बिचौलिए इसे बड़े पैमाने पर रिफाइनरियों तक पहुंचाते हैं, जहां इसे कानूनी तौर पर निकाले गए कोबाल्ट के साथ मिला दिया जाता है। एक बार मिल जाने के बाद यह पहचानना लगभग नामुमकिन हो जाता है कि कौन सा कोबाल्ट किसी 6 साल के बच्चे ने निकाला था और कौन सा मशीनों से निकला है।
भले ही वैश्विक कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में ‘जीरो चाइल्ड लेबर’ नीति का दावा करती हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत आज भी रूह कंपा देने वाली है। अगली बार जब आप अपने स्मार्टफोन या गैजेट को चार्जिंग पर लगाएं, तो यह जरूर याद रखें कि उस स्क्रीन की चमक के पीछे अफ्रीका के किसी कोने में दबे एक मासूम बचपन की चीखें भी शामिल हैं।

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