प्लास्टिक मैन ऑफ इंडिया: कचरे से सड़कें बनाकर देश की तस्वीर बदलने वाले प्रोफेसर राजगोपालन वासुदेवन की प्रेरक कहानी
आज की आधुनिक जीवनशैली में प्लास्टिक हमारी दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सुबह के टूथब्रश से लेकर पानी की बोतलों, खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग और इलेक्ट्रॉनिक सामानों तक—हर जगह प्लास्टिक का दबदबा है। सहूलियत देने वाला यही तत्व इस्तेमाल के बाद सबसे बड़ा सिरदर्द बन जाता है। खाली मैदानों में प्लास्टिक के ढेर, जाम पड़ी नालियां और नदियों-समुद्रों में तैरता कचरा आज पूरी दुनिया के लिए एक विकराल पर्यावरणीय संकट बन चुका है। प्लास्टिक की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह ‘बायोडीग्रेडेबल’ नहीं है; यानी सैकड़ों सालों तक यह नष्ट नहीं होता और मिट्टी व पानी को जहरीला बनाता रहता है।
दुनियाभर के वैज्ञानिक और नीति-निर्माता जब इस संकट से पार पाने के लिए माथापच्ची कर रहे थे, तभी भारत के एक रसायन विज्ञान (Chemistry) के प्रोफेसर ने समस्या की जड़ को ही समाधान बना दिया। उन्होंने प्लास्टिक को एक लाइलाज बीमारी मानने के बजाय उसे एक मजबूत संसाधन में तब्दील कर दिया। यह शख्सियत हैं तमिलनाडु के प्रोफेसर राजगोपालन वासुदेवन, जिन्हें आज पूरा देश और दुनिया ‘प्लास्टिक मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से जानती है।
टीवी डिबेट की एक चिंगारी, जिसने बदल दी सोच
प्रोफेसर राजगोपालन वासुदेवन के इस क्रांतिकारी विचार की शुरुआत किसी हाई-टेक अंतरराष्ट्रीय लैब में नहीं, बल्कि उनके घर के लिविंग रूम में हुई थी। एक शाम वे टीवी देख रहे थे, जहाँ एक टॉक-शो में प्लास्टिक प्रदूषण और उसके घातक दुष्प्रभावों पर तीखी बहस चल रही थी। वक्ता लगातार इस बात पर जोर दे रहे थे कि प्लास्टिक धरती को निगल जाएगा और इसे खत्म करने का कोई आसान तरीका नहीं है।
उस डिबेट को देखते हुए प्रोफेसर वासुदेवन के मन में एक गहरा विचार कौंधा: “यदि प्लास्टिक को प्रकृति आसानी से नष्ट नहीं कर सकती, तो क्या हम इसे जबरन खत्म करने के बजाय किसी ऐसे काम में नहीं लगा सकते जो कभी नष्ट न होने पाए?” रसायन शास्त्र का एक जानकार होने के नाते वे जानते थे कि प्लास्टिक पेट्रोलियम का ही एक उपोत्पाद (बाय-प्रोडक्ट) है और बिटुमेन (तारकोल) भी पेट्रोलियम से ही निकलता है। यहीं से उनके दिमाग में यह विचार आया कि क्या प्लास्टिक और डामर को एक साथ मिलाया जा सकता है?

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लैब का संघर्ष और 2002 में बनी पहली प्लास्टिक सड़क
इस विचार को धरातल पर उतारना आसान काम नहीं था। प्रोफेसर वासुदेवन ने अपनी कॉलेज लैब में वर्षों तक दिन-रात रिसर्च की। कई प्रयोग विफल हुए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आखिरकार उन्होंने एक ऐसा अनूठा और सरल फॉर्मूला विकसित किया, जिसने सड़क निर्माण की पूरी तस्वीर बदल दी।
साल 2002 में उन्होंने अपनी तकनीक का पहला व्यावहारिक परीक्षण किया। उन्होंने तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली स्थित थियागराजर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के परिसर के भीतर अपनी तकनीक से प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल कर देश की पहली ‘प्लास्टिक सड़क’ तैयार की।
यह तकनीक कैसे काम करती है?
प्रोफेसर वासुदेवन की बनाई प्रक्रिया बेहद सरल और किफायती है:
- सबसे पहले प्लास्टिक कचरे (जैसे कैरी बैग, चिप्स के पैकेट, बोतल के ढक्कन) को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा (Shred) जाता है।
- इसके बाद गिट्टी यानी पत्थरों (Aggregate) को लगभग 170 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है।
- गर्म पत्थरों पर प्लास्टिक के टुकड़ों को डाला जाता है। तेज गर्मी के कारण प्लास्टिक पिघलकर पत्थरों की बाहरी सतह पर एक मजबूत और पतली परत (Coating) बना लेता है।
- अंत में, इस प्लास्टिक-कोटेड पत्थर के मिश्रण को बिटुमेन (डामर) के साथ मिला दिया जाता है।
इस प्रक्रिया से बनी सड़क सामान्य डामर वाली सड़क की तुलना में कहीं अधिक मजबूत साबित हुई। यह पानी को सोखने से रोकती है, जिससे बारिश के दिनों में सड़कों पर गड्ढे नहीं पड़ते और सड़क की उम्र लगभग दोगुनी हो जाती है।
अरबों का ऑफर ठुकराया, देश को मुफ्त दी तकनीक
जब प्रोफेसर वासुदेवन की यह तकनीक सफल साबित हुई, तो इसकी गूंज विदेशों तक पहुँची। कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और विकसित देशों ने उनसे संपर्क किया। विदेशी फर्मों ने इस पेटेंट फॉर्मूले को भारी-भरकम रकम देकर खरीदने की पेशकश की। कोई भी साधारण व्यक्ति उन करोड़ों-अरबों के प्रस्तावों के आगे झुक सकता था, लेकिन प्रोफेसर वासुदेवन का मकसद पैसा कमाना नहीं था।
वे अपनी मातृभूमि की सेवा करना चाहते थे। उन्होंने विदेशी कंपनियों के सारे लुभावने ऑफर्स को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि यह तकनीक उनके देश की समस्याओं को सुलझाने के लिए है। इसके बाद उन्होंने अपनी इस बहुमूल्य और पेटेंटेड टेक्नोलॉजी को भारत सरकार को बिल्कुल ‘मुफ्त’ सौंप दिया। उनका सपना केवल यह था कि भारत की सड़कों का सुधार हो और देश प्लास्टिक के कचरे से मुक्त बने।

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पंचायत से नेशनल हाईवे तक का सफर
तकनीक तैयार होने के बाद इसे सरकारी व्यवस्था में शामिल कराना एक नई प्रशासनिक चुनौती थी। किसी भी नई तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए कड़े परीक्षणों और सरकारी मंजूरियों की आवश्यकता होती है। प्रोफेसर वासुदेवन ने लगातार प्रयास जारी रखे और अपनी बात सरकारी स्तर पर पहुंचाई।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राजमार्ग मंत्रालयों ने जब इस तकनीक का परीक्षण किया, तो नतीजे बेहद संतोषजनक पाए गए। इसके बाद सरकार ने सड़क निर्माण में बेकार प्लास्टिक के इस्तेमाल को अनिवार्य और प्रोत्साहित करने वाले दिशा-निर्देश जारी किए।
आज देश के ग्रामीण अंचलों, पंचायतों और नगर पालिकाओं से लेकर बड़े-बड़े राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) के निर्माण में इस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। हजारों टन प्लास्टिक जो कभी लैंडफिल में सड़कर हवा और पानी को जहरीला बना रहा होता, वह आज देश की मजबूत सड़कों के नीचे दबकर इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूती दे रहा है।
पद्म श्री सम्मान और एक अमर संदेश
पर्यावरण संरक्षण और सिविल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में प्रोफेसर वासुदेवन के इस ऐतिहासिक और निस्वार्थ योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2018 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाजा।
प्रोफेसर राजगोपालन वासुदेवन की यह प्रेरक यात्रा सिखाती है कि किसी भी बड़ी वैज्ञानिक क्रांति के लिए हमेशा अरबों रुपये के बजट की जरूरत नहीं होती; जरूरत होती है सही नीयत, गहरी सोच और देशहित की भावना की। उन्होंने दुनिया को यह साबित करके दिखाया कि जिसे दुनिया कूड़ा समझकर फेंक देती है, सही वैज्ञानिक दृष्टि से उसे भी देश की प्रगति का आधार बनाया जा सकता है।

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