बेनीवाल, ज्योति और विश्वेंद्र सिंह समेत कई राजनीतिक परिवारों की बढ़ी सियासी टेंशन; आरक्षण से कई सीटों पर नए चेहरों को मिलेगा मौका
जयपुर। राजस्थान में पंचायत चुनाव के लिए जारी आरक्षण लॉटरी ने कई दशकों से जिला प्रमुख की राजनीति में प्रभाव रखने वाले बड़े राजनीतिक परिवारों के समीकरण बदल दिए हैं। लॉटरी के बाद प्रदेश के 11 जिलों के करीब 23 प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों को अब अपनी रणनीति नए सिरे से तैयार करनी होगी। खास तौर पर नागौर, जैसलमेर और भरतपुर में आरक्षण की स्थिति ने कई दिग्गज परिवारों की सीधे तौर पर दावेदारी कमजोर कर दी है।
रिपोर्ट के अनुसार, जिन जिलों में जिला प्रमुख का पद आरक्षित वर्ग के लिए चला गया है, वहां लंबे समय से प्रभाव रखने वाले राजनीतिक परिवार अपने पसंदीदा उम्मीदवार को सीधे जिला प्रमुख नहीं बनवा सकेंगे। ऐसे में इन परिवारों को अपने समर्थक या नए चेहरे पर दांव लगाना पड़ेगा। वहीं जोधपुर, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, बाड़मेर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में राजनीतिक परिवारों का प्रभाव चुनावी रणनीति में आगे भी दिखाई देने की संभावना है।
नागौर में मिर्धा-बेनीवाल परिवारों के सामने नई चुनौती
नागौर की राजनीति में मिर्धा और बेनीवाल परिवारों का लंबे समय से प्रभाव रहा है। आरक्षण की नई स्थिति के कारण इन परिवारों से सीधे जिला प्रमुख पद के लिए दावेदारी मुश्किल हो गई है। ऐसे में दोनों राजनीतिक खेमों को अब अपने समर्थक चेहरे की तलाश करनी होगी।
रिपोर्ट में रामनिवास मिर्धा, रामदेव बेनीवाल और महेंद्र चौधरी से जुड़े राजनीतिक परिवारों के प्रभाव का उल्लेख किया गया है। रामनिवास मिर्धा के बेटे हरेंद्र मिर्धा भी जिला प्रमुख रह चुके हैं। वहीं रामनाथ चौधरी नागौर से कांग्रेस सांसद रहे हैं। महेंद्र चौधरी की पत्नी सुनीता चौधरी भी जिला प्रमुख रह चुकी हैं।
वर्ष 2020 के चुनाव में जिला प्रमुख की सीट सामान्य थी। उस समय भाजपा ने भागीरथ चौधरी को उम्मीदवार बनाया था। चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में क्रॉस वोटिंग के बाद मुकाबला टाई हो गया था और लॉटरी के जरिए भाजपा प्रत्याशी की जीत हुई थी। अब आरक्षण बदलने से पुराने राजनीतिक समीकरणों पर फिर असर पड़ा है।
जैसलमेर में फकीर परिवार की दशकों पुरानी पकड़ को झटका
जैसलमेर में जिला प्रमुख पद एसटी ओपन (अनुसूचित जनजाति) के लिए आरक्षित होने से लंबे समय से प्रभाव रखने वाले राजनीतिक परिवारों के समीकरण बदल गए हैं। जैसलमेर को सामान्य और मुस्लिम ओबीसी बहुल क्षेत्र माना जाता है, ऐसे में एसटी ओपन सीट ने राजनीतिक दावेदारियों को पूरी तरह नया रूप दे दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, जैसलमेर की स्थानीय राजनीति में दिवंगत गाजी फकीर और पूर्व कैबिनेट मंत्री सालेह मोहम्मद के परिवार का लंबे समय से प्रभाव रहा है। फकीर परिवार के प्रभाव के चलते कांग्रेस इस सीट पर मजबूत दावेदारी करती रही है और परिवार से जुड़े चेहरे ने कई बार जिला प्रमुख पद संभाला है।
अब आरक्षण के कारण पारंपरिक राजनीतिक चेहरे सीधे मुकाबले से बाहर हो सकते हैं। ऐसे में बड़े परिवारों को किसी नए या समर्थक चेहरे को आगे करना पड़ेगा।
जोधपुर में मदेरणा परिवार का प्रभाव बरकरार रहने की संभावना
जोधपुर में जिला प्रमुख पद की राजनीति में मदेरणा परिवार का लंबे समय से प्रभाव रहा है। रिपोर्ट में वर्ष 1982 से ही मदेरणा परिवार के मजबूत राजनीतिक प्रभाव का उल्लेख किया गया है। पिछले चुनावों में भी परिवार ने अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया।
आरक्षण लॉटरी में जिला प्रमुख पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने से समीकरण बदले हैं, लेकिन मदेरणा परिवार के प्रभाव को पूरी तरह खत्म नहीं माना जा रहा। ऐसे में इस बार भी परिवार की ओर से समर्थित महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारने की रणनीति पर नजर रहेगी।
भरतपुर में राजनीतिक विरासत के सामने नई चुनौती
भरतपुर में भी आरक्षण ने राजनीतिक परिवारों की पारंपरिक दावेदारी को प्रभावित किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भरतपुर की राजनीति में राजपरिवार और अन्य प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों की भूमिका रही है, लेकिन मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के कारण इन परिवारों के लिए सीधे अपने परिवार के सदस्य को जिला प्रमुख बनाना आसान नहीं होगा।
ऐसे में इन परिवारों को अपने किसी भरोसेमंद समर्थक या नए चेहरे को आगे करना पड़ सकता है। रिपोर्ट में पूर्व केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह के परिवार सहित भरतपुर के प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों का उल्लेख किया गया है। पिछले चुनाव में भी कांग्रेस सदस्यों की क्रॉस वोटिंग चर्चा में रही थी।
झुंझुनूं में ओला परिवार की सियासी पकड़
झुंझुनूं में ओला परिवार का जिला प्रमुख की राजनीति में लंबा प्रभाव रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, ओला परिवार से जुड़े नेता करीब 16 वर्षों तक जिला प्रमुख पद पर रहे। वर्ष 2000 में उनके बेटे बृजेंद्र ओला जिला प्रमुख बने और इसके बाद 2005 से 2010 तक उनकी पत्नी राजबाला ओला जिला प्रमुख रहीं।
पिछले चुनाव में सीट ओबीसी महिला के लिए आरक्षित थी। अब आरक्षण के नए समीकरण में परिवार के सामने फिर से अपनी राजनीतिक रणनीति तय करने की चुनौती है। रिपोर्ट में पूर्व सांसद और अन्य प्रभावशाली परिवारों के बीच संभावित मुकाबले का भी उल्लेख किया गया है।
बीकानेर में मेघवाल-डूडी परिवारों की प्रतिष्ठा का सवाल
बीकानेर में मेघवाल और डूडी परिवारों का राजनीतिक प्रभाव भी लंबे समय से रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इन परिवारों के सदस्य या उनके समर्थक जिला प्रमुख बनते रहे हैं। इसलिए इस बार भी दोनों परिवारों के बीच राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण रहेंगे।
इसके अलावा पूर्व मंत्री गोविंद राम जैसे नेताओं के परिवारों का भी क्षेत्र की राजनीति में प्रभाव बताया गया है। वर्ष 2000 से 2010 तक रामेश्वर डूडी जिला प्रमुख रहे और इसके बाद भी उनके समर्थकों को लगातार पद मिलने का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।
अब डूडी की पत्नी विधायक मुरलीला डूडी पर राजनीतिक जिम्मेदारी अधिक रहने की बात कही गई है। पिछले चुनाव में सीट एसटी ओपन के लिए आरक्षित थी, जिसमें डूडी समर्थक मोडाराम मेघवाल जिला प्रमुख बने थे।
आरक्षण ने बदली रणनीति, नए चेहरों पर दांव
पंचायत चुनाव की आरक्षण लॉटरी ने साफ कर दिया है कि राजस्थान के कई जिलों में इस बार पुराने राजनीतिक परिवार सीधे अपने परिवार के सदस्य को जिला प्रमुख पद पर नहीं बैठा पाएंगे। ऐसे में समर्थक उम्मीदवार, परिवार से जुड़े नए चेहरे और सामाजिक समीकरण चुनाव की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
सबसे बड़ा बदलाव उन जिलों में देखने को मिलेगा जहां सीट एसटी, एससी, ओबीसी या महिला वर्ग के लिए आरक्षित हुई है। दूसरी ओर, जिन जिलों में आरक्षण पुराने राजनीतिक परिवारों के अनुकूल है, वहां परिवारवाद की राजनीति और प्रभावशाली राजनीतिक घरानों की भूमिका पहले की तरह मजबूत रहने की संभावना है।
कुल मिलाकर पंचायत चुनाव की लॉटरी ने राजस्थान की जिला प्रमुख की राजनीति में बड़ा फेरबदल कर दिया है। अब देखना होगा कि बेनीवाल, मिर्धा, मदेरणा, फकीर, ओला, डूडी और अन्य प्रभावशाली राजनीतिक परिवार बदले हुए आरक्षण समीकरण में किस नए चेहरे पर दांव लगाते हैं।

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