भारत का अनोखा ‘टॉय विलेज’: जहां हर घर में गूंजती है खिलौनों की खनक, जानिए इस 300 साल पुरानी विरासत और GI टैग की दिलचस्प कहानी
आज के आधुनिक दौर में जहां बच्चों का बचपन प्लास्टिक के खिलौनों, मोबाइल स्क्रीन और डिजिटल वीडियो गेम्स के बीच सिमट कर रह गया है, वहीं भारत का एक ऐसा कस्बा भी है जो सदियों पुरानी हस्तशिल्प और पर्यावरण-अनुकूल खिलौनों की परंपरा को पूरी शिद्दत से जीवित रखे हुए है। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से मैसूर राजमार्ग पर लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर बसा ‘चन्नपटना’ (Channapatna) कोई आम कस्बा नहीं है। इसे देश और दुनिया भर में ‘गोम्बेगला ऊरु’ (Gombegala Ooru) यानी ‘खिलौनों का शहर’ के नाम से जाना जाता है।
चन्नपटना की गलियों में कदम रखते ही आपको लेथ मशीनों की घरघराहट, लकड़ी की भीनी-भीनी खुशबू और चमकीले रंगों में रंगे काष्ठ शिल्प की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। यहां की विशेषता यह है कि कस्बे के लगभग हर घर में खिलौने बनाने वाले हुनरमंद कारीगर मौजूद हैं। पीढ़ियों से चला आ रहा यह पुश्तैनी हुनर केवल एक कला नहीं, बल्कि यहां के परिवारों की प्राथमिक आजीविका का मुख्य आधार भी है।

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18वीं सदी का शाही इतिहास: टीपू सुल्तान और फारसी कला का संगम
चन्नपटना की इस बेमिसाल काष्ठ कला की जड़ें 18वीं सदी के ऐतिहासिक पन्नों में गहराई से जुड़ी हैं। मैसूर के तत्कालीन शासक टीपू सुल्तान को वैश्विक कला, शिल्प और उन्नत तकनीकों का गहरा शौक था। इतिहास के अनुसार, टीपू सुल्तान को फारसी हस्तशिल्प से खास लगाव था।
स्थानीय कारीगरों को नई तकनीक से रूबरू कराने और उनके हुनर को तराशने के उद्देश्य से टीपू सुल्तान ने फारस (वर्तमान ईरान) से दक्ष और अनुभवी शिल्पकारों को अपने राज्य में आमंत्रित किया। इन विदेशी कारीगरों ने स्थानीय कारीगरों को लकड़ी पर लैक्वेयर (लाख) की परत चढ़ाने, खराद मशीन पर नक्काशी करने और चमकदार फिनिशिंग देने की बारीकियां सिखाईं। इस पूरी विधा को चन्नपटना में स्थापित करने और स्थानीय लोगों को संगठित रूप से प्रशिक्षित करने का मुख्य श्रेय उस्ताद बावास मिया को जाता है। उन्होंने इस कला को स्थानीय जीवनशैली का हिस्सा बना दिया, जिसके बाद यह हुनर घर-घर में फैल गया।
100% प्राकृतिक और बाल-सुरक्षित: चन्नपटना खिलौनों की असली खासियत
चन्नपटना के खिलौनों की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) उनकी पर्यावरण-अनुकूलता और बच्चों के लिए 100 फीसदी सुरक्षित होना है। वर्तमान समय में बाजार में बिकने वाले अधिकांश प्लास्टिक खिलौनों में हानिकारक केमिकल्स, लेड (सीसा) और टॉक्सिक रंगों का खतरा बना रहता है, लेकिन चन्नपटना के खिलौने पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं।
- कच्चा माल: इन खिलौनों को तराशने के लिए मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर पाई जाने वाली ‘आले मारा’ (आइवोरीन वुड) की हल्की और मुलायम लकड़ी का उपयोग किया जाता है। यह लकड़ी बच्चों के खेलने के लिए पूरी तरह सुरक्षित, हल्की और टिकाऊ मानी जाती है।
- निर्माण प्रक्रिया: सबसे पहले लकड़ी को खराद (लेथ मशीन) पर तेजी से घुमाया जाता है और अनुभवी कारीगर अपनी छेनी की मदद से उसे मनचाहा आकार देते हैं।
- प्राकृतिक रंग (वेजिटेबल डाइस): खिलौनों को रंगने के लिए किसी भी सिंथेटिक पेंट का उपयोग नहीं होता। प्राकृतिक लाख में हल्दी (पीला रंग), नील (नीला रंग), कुमकुम (लाल रंग) और कत्था (भूरा रंग) मिलाकर रंगीन छड़ियां बनाई जाती हैं।
- घर्षण से कोटिंग: घूमती हुई लकड़ी पर इन रंगीन छड़ियों को हल्के दबाव के साथ रगड़ा जाता है। घर्षण से पैदा होने वाली गर्मी से लाख पिघलकर लकड़ी पर एक समान, चमकदार और स्थायी परत चढ़ा देती है। अंत में ताड़ के पत्तों की मदद से इस पर प्राकृतिक चमक लाई जाती है।

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जब मिला जीआई (GI) टैग: वैश्विक पटल पर ऐतिहासिक पहचान
चन्नपटना के खिलौनों की विशिष्ट भौगोलिक पहचान, ऐतिहासिक प्रासंगिकता और पारंपरिक मौलिकता को संरक्षित करने के लिए जनवरी 2006 में इसे आधिकारिक रूप से भौगोलिक संकेत यानी जीआई (Geographical Indication – GI) टैग प्रदान किया गया। जीआई टैग मिलने से न केवल इस कला की नकल और मिलावट पर कानूनी रोक लगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके निर्यात और ब्रांड वैल्यू में भारी उछाल आया।
आधुनिकता और परंपरा का संगम: ‘चन्नपटना क्राफ्ट्स पार्क’
पारंपरिक कारीगरों को बिचौलियों से बचाने और वैश्विक बाजार की बदलती मांगों के अनुरूप तैयार करने के लिए कर्नाटक सरकार ने ‘चन्नपटना क्राफ्ट्स पार्क’ की स्थापना की है।
इस समर्पित पार्क में 15 से अधिक अत्याधुनिक मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट क्लस्टर संचालित हैं। यहाँ कारीगरों को आधुनिक लेथ मशीनें, नई डिजाइनिंग तकनीक, उन्नत पैकेजिंग और सीधे विदेशी खरीदारों तक पहुंच की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। आज लगभग 1500 से अधिक पंजीकृत शिल्पकार इस उद्योग से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।
वैश्विक मंच पर गूंज और ‘वोकल फॉर लोकल’
हाल के वर्षों में पर्यावरण संरक्षण, इको-फ्रेंडली जीवनशैली और भारत सरकार के ‘वोकल फॉर लोकल’ व ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों ने इस 300 साल पुरानी कला में नई ऊर्जा भर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति से लेकर विदेशी राजनयिकों के भारत दौरे पर चन्नपटना के खिलौने स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट किए जाते रहे हैं।
आज चन्नपटना के कारीगर पारंपरिक खिलौनों के अलावा लकड़ी की घड़ियां, पेन स्टैंड, सजावटी वस्तुएं, आधुनिक पहेलियां और होम डेकोर उत्पाद भी तैयार कर रहे हैं। यूरोप, अमेरिका और मध्य पूर्व के देशों में इन खिलौनों की भारी मांग है। प्लास्टिक के बढ़ते प्रदूषण के दौर में, चन्नपटना का यह खिलौना गांव पूरी दुनिया को सिखा रहा है कि कैसे पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए खूबसूरत और सुरक्षित भविष्य गढ़ा जा सकता है।

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