भीषण गर्मी में जब सूरज आसमान से आग बरसा रहा हो और पसीने से तरबतर शरीर सिर्फ राहत की तलाश में हो, तब कान में पड़ा ‘आइसक्रीम’ का एक लफ्ज़ भी सूखी जमीन पर बारिश की पहली बूंद जैसा अहसास करा देता है। दफ्तर का तनाव हो, ब्रेकअप का दर्द या फिर जिंदगी की रोजमर्रा की माथापच्ची—आइसक्रीम का एक ठंडा, क्रीमी चम्मच मुंह में जाते ही दिमाग की सारी गरमाहट गायब हो जाती है। ऐसा लगता है मानो किसी ने तपती दोपहरी में रूह के भीतर 16 डिग्री पर एयर कंडीशनर ऑन कर दिया हो। वैनिला, चॉकलेट, स्ट्रॉबेरी या बटरस्कॉच के दीवानों के लिए आइसक्रीम सिर्फ एक डेजर्ट नहीं, बल्कि सुकून का दूसरा नाम है।
मगर हमारी इस दुनिया में कुछ ऐसे ‘क्रिएटिव जीनियस’ भी बसते हैं, जिन्हें सीधी-सादी जिंदगी रास नहीं आती। जब तक वे किसी मुकम्मल और सुकून देने वाली चीज में अपनी ढेले भर की अक्ल घुसाकर उसका कबाड़ा न कर दें, तब तक उन्हें चैन की नींद नहीं आती। इंटरनेट पर मैगी के साथ आइसक्रीम और चाय के साथ गुलाब जामुन का तमाशा तो हम झेल ही रहे थे, लेकिन अब इस सनक की लिस्ट में देश की सबसे चहेती और भरोसेमंद डेयरी ब्रांड ‘अमूल’ का नाम भी जुड़ गया है। जिस अमूल के मक्खन और आइसक्रीम को खाकर हमारी पीढ़ियां बड़ी हुईं, उसी ने अब आइसक्रीम प्रेमियों के सीने पर ऐसा पत्थर दे मारा है कि ठंडक मिलने की बजाय लोगों के दिमाग का पारा 50 डिग्री पार कर गया है।

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अमूल ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल पर बड़े गर्व से ऐलान किया कि वे बाजार में एक क्रांतिकारी फ्लेवर उतार चुके हैं—‘इसबगोल आइसक्रीम’। जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना और आपकी आंखों को कोई धोखा नहीं हुआ है। वही इसबगोल, जिसका नाम सुनते ही घर के बुजुर्गों, कब्ज और बदहजमी की याद ताजा हो जाती है, अब आपके पसंदीदा आइसक्रीम टब में सजाकर परोसा जा रहा है। खबर सुनते ही सोशल मीडिया पर ऐसा सन्नाटा खिंच गया, जैसे भरी महफिल में किसी ने अचानक गमी का मातम छेड़ दिया हो।
अब जो लोग इस धरती के नहीं हैं या जिन्हें घरेलू नुस्खों से कभी पाला नहीं पड़ा, उन्हें थोड़ा ज्ञान दे देते हैं। इसबगोल असल में ‘प्लांटागो ओवाटा’ (Plantago ovata) नामक पौधे के बीजों से मिलता है। इस पौधे की टहनियों पर जो सफेद, रेशेदार भूसी चिपकी होती है, उसे ही ‘साइलियम हस्क’ यानी इसबगोल की भूसी कहा जाता है। सदियों से हमारे घरों में इसे कोई शौक से नहीं खाता, बल्कि जब पेट में गड़बड़झाला हो, मोशन साफ न हो रहा हो, दस्त, डिहाइड्रेशन, मोटापा या डायबिटीज जैसी दिक्कतें घेर लें, तब मजबूरी में इसे गुनगुने पानी या दूध में घोलकर आंख-नाक बंद करके गटक लिया जाता है। इसका अपना न कोई रंग होता है, न स्वाद, बस एक चिपचिपा अहसास होता है जो पेट को दुरुस्त करने के काम आता है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या दुनिया में स्वादों का अकाल पड़ गया था? क्या मैंगो, पिस्ता, बेल्जियम चॉकलेट और ब्लैक करंट जैसे शानदार फ्लेवर कम पड़ गए थे जो अमूल को पेट साफ करने वाली दवा को आइसक्रीम में झोंकने की जरूरत महसूस हुई? माना कि इसबगोल सेहत के लिए वरदान है, फाइबर से भरपूर है और पाचन के लिए रामबाण है; लेकिन इसका मतलब यह तो कतई नहीं कि आप मेडिकल स्टोर के नुस्खे को उठाकर सीधे आइसक्रीम पार्लर के फ्रीजर में जमा दें! आइसक्रीम इंसान अपनी जुबान के स्वाद और दिल के सुकून के लिए खाता है, पेट के अल्सर या कब्ज की दवा समझकर नहीं।

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अगर अमूल के इस ट्रेंड को हरी झंडी मिल गई, तो वह दिन दूर नहीं जब बाजार में सिरदर्द और बुखार की दवा ‘डोलो-650 चोकोबार’, पेट दर्द के लिए ‘पुदीन हरा संडे’ और जुकाम मिटाने के लिए ‘विकॉस वेपोरब कोन’ बिकने लगेगी। उस दिन आइसक्रीम लवर्स की हालत ‘देवदास’ के शाहरुख खान से भी बदतर हो जाएगी, जो रो-रोकर यही गाएंगे कि ‘कौन कंबख्त खाता है स्वाद के लिए!’
यही वजह है कि इसबगोल आइसक्रीम का पोस्टर सामने आते ही इंटरनेट पर मीम्स की बाढ़ आ गई है। यूजर्स सिर पकड़कर बैठ गए हैं और अमूल से हाथ जोड़कर विनती कर रहे हैं कि कम से कम उनके बचपन के प्यार यानी आइसक्रीम को तो इस तरह के ‘हेल्दी अत्याचार’ से बख्श दिया जाए। स्वाद और दवा का यह जबरन निकाह लोगों के गले से नीचे नहीं उतर रहा है। अब देखना यह है कि अमूल का यह पेट साफ करने वाला आइसक्रीम फॉर्मूला लोगों के दिल में जगह बना पाता है या फिर इसे इतिहास के सबसे अजीबोगरीब प्रयोगों के कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है।

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